चीन के दबदबे को चुनौती और ₹10,000 करोड़ का निवेश
सरकार ने कंटेनर प्रोडक्शन के क्षेत्र में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने का फैसला किया है, और यह कदम चीन के ग्लोबल मार्केट में लगभग एकाधिकार को चुनौती देता है। भारत की मौजूदा सालाना 30,000 यूनिट्स की क्षमता, चीन की सालाना लगभग 60 लाख यूनिट्स की तुलना में बहुत कम है, जो इस पहल के बड़े पैमाने को दर्शाती है। यह ₹10,000 करोड़ का निवेश उस सेगमेंट में घरेलू निवेश की नींव रखेगा जहां चीन का दबदबा भारी है। यह पहल लोकल स्किल और मैन्युफैक्चरिंग पावर को बढ़ाने की एक अहम पॉलिसी शिफ्ट है, जिसका लक्ष्य ग्लोबल मार्केट का एक हिस्सा हासिल करना है। इंडस्ट्री एनालिस्ट्स के अनुसार, ग्लोबल सप्लाई चेन में आई पिछली बाधाओं के बाद इस सीधी पहल से एक महत्वपूर्ण गैप को भरा जाएगा।
लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम और डिमांड पर फोकस
कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग एक लेबर-इंटेंसिव (श्रम-गहन) इंडस्ट्री है और इसके लिए Corten Steel जैसे खास मैटेरियल्स की जरूरत पड़ती है। Corten Steel की स्थिर घरेलू सप्लाई या कॉम्पिटिटिव इंपोर्ट चैनल इस प्रोग्राम की सफलता के लिए अहम होंगे। सरकार का यह कदम भारत के लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम को मजबूत करने के एक बड़े ऑब्जेक्टिव के साथ जुड़ा है। SAMCO Securities के एनालिस्ट्स का मानना है कि इससे कार्गो मोबिलिटी (माल ढुलाई) में सुधार होगा, माल भाड़ा (freight costs) कम होंगे और सप्लाई चेन की एफिशिएंसी (दक्षता) बढ़ेगी। आधुनिक कंटेनरों की उपलब्धता बढ़ने से रोड की जगह रेल से माल ढुलाई की ओर एक तेज़ बदलाव आने की उम्मीद है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर और एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए बल्क ट्रांसपोर्टेशन (थोक परिवहन) तेज़ और किफायती होगा। यह पहल 'भारत कंटेनर शिपिंग लाइन' (BCSL) के ऑपरेशनल होने के साथ भी मेल खाती है, जिसे शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया जैसी सरकारी कंपनियों का समर्थन हासिल है।
रिसर्च से पता चलता है कि फूड एंड बेवरेज सेक्टर, खासकर पैक्ड फूड्स और फ्रेश प्रोड्यूस (ताजे फल-सब्जियां) से मजबूत डिमांड है। फार्मास्यूटिकल्स (दवाएं, वैक्सीन) और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री (पार्ट्स, इंजन) भी प्रमुख डिमांड सेंटर हैं। COVID-19 महामारी के दौरान ग्लोबल कंटेनर की कमी ने सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर किया था, जिससे यह डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग पुश जरूरी हो गया। जहां चीन फिलहाल ~95% ग्लोबल मार्केट शेयर के साथ राज कर रहा है, वहीं भारत की एंट्री का लक्ष्य मौजूदा 30,000 यूनिट्स प्रति वर्ष की क्षमता से आगे बढ़कर इस महत्वपूर्ण बाजार का एक हिस्सा हासिल करना है।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
यह स्कीम एक मजबूत डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाने का एक दृढ़ प्रयास है, जो आयातित कंटेनरों पर भारत की निर्भरता को काफी कम करेगा। इसका उद्देश्य लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्री में जॉब क्रिएशन (रोजगार सृजन) को बढ़ावा देना और देश के बढ़ते रेलवे और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ अधिक मजबूती से जुड़ना है। इस पहल की सफलता केवल प्रोडक्शन वॉल्यूम से नहीं, बल्कि ओवरऑल ट्रेड एफिशिएंसी (व्यापार दक्षता) और ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की स्थिति को मजबूत करने में इसके योगदान से मापी जाएगी।