भारत की गर्मी का 'कूल' बूस्ट: कूलिंग टेक की डिमांड बढ़ी, पर पॉलिसी गैप रोड़ा

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत की गर्मी का 'कूल' बूस्ट: कूलिंग टेक की डिमांड बढ़ी, पर पॉलिसी गैप रोड़ा
Overview

भारत में जानलेवा गर्मी का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है, जिसके चलते देश में कूलिंग की मांग में भारी उछाल आने की उम्मीद है। यह मांग साल 2037-38 तक **आठ गुना** बढ़ सकती है। ऐसे में, पारंपरिक एयर कंडीशनर (AC) के मुकाबले डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम (DCS) एक ज्यादा कुशल और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के तौर पर उभर रहा है। हालांकि, भारत में DCS के लिए स्पष्ट कानूनों और नियमों की कमी इस तकनीक को अपनाने की राह में बड़ी बाधा बन रही है, जिससे इसकी रफ्तार धीमी हो गई है।

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भीषण गर्मी और बढ़ती कूलिंग की जरूरत

भारत इस वक्त भीषण गर्मी की चपेट में है, जहां रिकॉर्ड तोड़ तापमान और हीटवेव देश के 57% से अधिक जिलों को प्रभावित कर रहे हैं। इस अभूतपूर्व स्थिति के कारण देश में कूलिंग (ठंडा रखने) की जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिनके वर्ष 2037-38 तक आठ गुना तक बढ़ने का अनुमान है। मौजूदा समय में एसी (AC) ही कूलिंग का मुख्य जरिया है, लेकिन ये शहरी गर्मी को बढ़ाते हैं और राष्ट्रीय पावर ग्रिड पर भारी दबाव डालते हैं। अभी ही कूलिंग पर भारत की पीक इलेक्ट्रिसिटी डिमांड का लगभग 10% खर्च होता है, और यह आंकड़ा तेजी से बढ़ने वाला है। आर्थिक मोर्चे पर भी, हीटवेव के कारण उत्पादन क्षमता में अरबों की हानि और ग्रामीण आजीविका तथा खाद्य सुरक्षा पर खतरे की आशंका है।

डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम (DCS): एक कुशल विकल्प

डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम (DCS) इस समस्या का एक महत्वपूर्ण, स्केलेबल और कुशल समाधान पेश करते हैं। ये सिस्टम पारंपरिक एसी यूनिट्स की तुलना में 30-50% तक ऊर्जा बचा सकते हैं और पीक पावर डिमांड को 80% तक कम कर सकते हैं। यह सिद्ध तकनीक सस्टेनेबल शहरी विकास और बेहतर क्लाइमेट रेजिलिएंस (जलवायु लचीलापन) के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कूलिंग मार्केट में ग्रोथ और बड़े प्रोजेक्ट्स

भारतीय डिस्ट्रिक्ट कूलिंग मार्केट का अनुमानित मूल्य 2025 में 6.6 बिलियन डॉलर है, जो 2034 तक बढ़कर 8.2 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। शहरीकरण और ऊर्जा दक्षता पर बढ़ते फोकस के कारण यह ग्रोथ आंकी जा रही है। वैश्विक स्तर पर भी सेंट्रलाइज्ड कूलिंग की ओर रुझान बढ़ रहा है।

इस दिशा में एक बड़े कदम के तहत, टाटा पावर (Tata Power), केपेल (Keppel) और टाटा रियलिटी (Tata Realty) चेन्नई के इंटेलियन पार्क (Intellion Park) में एक बड़े कूलिंग-एज-ए-सर्विस (CaaS) प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। अक्टूबर 2026 तक चालू होने वाले इस प्रोजेक्ट में 12,100 टन रेफ्रिजरेशन (TR) की कूलिंग क्षमता होगी और यह AI व ML का उपयोग करके 20% से अधिक ऊर्जा बचत का लक्ष्य रखेगा। यह प्रोजेक्ट सर्विस-आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर बढ़ते कदम को दर्शाता है। वहीं, तमिलनाडु जैसे राज्य भी पैसिव कूलिंग और शहरी कूलिंग प्लान्स के लिए पायलट प्रोजेक्ट्स चला रहे हैं। भारत के ओवरऑल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और ग्रीन प्रोजेक्ट्स के लिए मिलने वाले फंड्स भी DCS के इंटीग्रेशन को सपोर्ट करते हैं।

रेगुलेटरी बाधाएं और धीमा हो रहा एडॉप्शन

DCS के मजबूत पक्ष और बढ़ती कूलिंग डिमांड के बावजूद, भारत में इसके व्यापक रूप से अपनाने में मुख्य बाधा स्पष्ट नियमों और नीतियों का अभाव है। कोई व्यापक कानूनी ढांचा, स्पष्ट तकनीकी मानक या पूर्वानुमानित मूल्य निर्धारण (pricing) निवेशकों और डेवलपर्स के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहा है। भारत में DCS पाइप नेटवर्क, ज़ोनिंग नियम या मास्टर प्लान रेगुलेशन के लिए कोई विशेष मानक नहीं हैं। महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों ने DCS प्राइसिंग पेश करना शुरू कर दिया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकरण (standardization) की जरूरत है ताकि DCS पारंपरिक कूलिंग लागतों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सके और बाजार का विश्वास जीत सके। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) और UNEP के दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन उन्हें स्पष्ट मूल्य निर्धारण के साथ लागू करने योग्य नियमों में बदलना होगा। एक प्रमुख मुद्दा जोखिम आवंटन (risk allocation) का है: डेवलपर्स को अक्सर लंबी अवधि की डिमांड पूर्वानुमानों के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ता है, जो यह काम यूटिलिटी प्रोवाइडर्स के लिए अधिक उपयुक्त है जो ऐसे जोखिमों का प्रबंधन करते हैं। यह रेगुलेटरी अनिश्चितता एक बड़ी बाधा है, लेकिन यह सक्रिय कंपनियों के लिए क्षेत्र को आकार देने, मानक स्थापित करने और मजबूत शासन (governance) व नीति बनाकर निवेश आकर्षित करने का अवसर भी है।

आगे का रास्ता

DCS को भारत के शहरों में सफलतापूर्वक एकीकृत करने के लिए इन रेगुलेटरी चुनौतियों का समाधान महत्वपूर्ण है। यदि इन नीतिगत खामियों को भरा जाता है, तो DCS भारत की कूलिंग जरूरतों को स्थायी तरीके से पूरा करने के तरीके को बदल सकता है, जिससे 2070 तक नेट जीरो (Net Zero) जैसे जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी। बाजार में शहरीकरण, ऊर्जा दक्षता पर फोकस और क्लीन एनर्जी के लिए सरकारी समर्थन से लगातार ग्रोथ की उम्मीद है। DCS का विस्तार भारत की शहरी विकास योजनाओं, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स और क्लाइमेट-रेसिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता के साथ अच्छी तरह से फिट बैठता है, जो इसे देश के स्थायी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बनाता है।

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