भारत का ग्रीन स्टील मिशन: क्वालिटी और लागत की राह में बड़ी चुनौतियाँ

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत का ग्रीन स्टील मिशन: क्वालिटी और लागत की राह में बड़ी चुनौतियाँ
Overview

भारत सरकार की ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी और सरकारी उपक्रमों (PSUs) द्वारा इसे खरीदने के फरमान के बाद, Tata Steel, JSW Steel और ArcelorMittal Nippon Steel जैसी बड़ी स्टील कंपनियां स्क्रैप रीसाइक्लिंग और ग्रीन स्टील उत्पादन में अपना निवेश बढ़ा रही हैं। लेकिन, डोमेस्टिक स्क्रैप की क्वालिटी और ग्रीन स्टील की बढ़ी हुई लागत जैसी चुनौतियां इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य में बाधा बन रही हैं।

सरकारी पहलों से ग्रीन स्टील को मिली रफ्तार

भारत ने स्थायी विनिर्माण (sustainable manufacturing) की ओर एक बड़ा कदम उठाया है। देश के सबसे अहम उद्योगों में से एक, स्टील सेक्टर के लिए हाल ही में 'ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी' (Green Steel Taxonomy) लॉन्च की गई है। यह एक ऐसा नियम-कानून है जो कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता (carbon emission intensity) के आधार पर स्टील को स्टार रेटिंग देता है। इसके तहत, 2.2 टन CO2e प्रति टन फिनिश्ड स्टील (tfs) से कम उत्सर्जन वाले स्टील को 'ग्रीन' माना जाएगा, जबकि 1.6 t से कम उत्सर्जन वालों को फाइव-स्टार रेटिंग मिलेगी। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सेकेंडरी स्टील टेक्नोलॉजी (NISST) इस क्लासिफिकेशन के लिए नोडल एजेंसी है। यह टैक्सोनॉमी दुनिया भर के मानकों, जैसे यूरोपियन यूनियन के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) से तालमेल बिठाने में मदद करेगी, जो आयातित माल पर कार्बन लागत लगा सकता है।

इसके अलावा, एक महत्वपूर्ण निर्णय यह भी लिया गया है कि सरकारी उपक्रम (PSUs) अब प्रमाणित ग्रीन स्टील की खरीद करेंगे। यह नियम फाइनेंशियल ईयर 28 (FY28) से 1 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले आयरन और स्टील प्रोजेक्ट्स के लिए लागू होगा। इस खरीद नीति के तहत, फाइव-स्टार रेटेड स्टील के लिए न्यूनतम 1% और थ्री-स्टार रेटेड स्टील के लिए 20% तक की खरीद का लक्ष्य है। इससे भारत की कुल स्टील खपत का लगभग 22% हिस्सा कवर होगा, जो कंपनियों को मांग की निश्चितता (demand certainty) प्रदान करेगा।

कंपनियों का एक्शन और मार्केट में क्या है स्थिति (16 फरवरी 2026 तक)

इस नई दिशा में आगे बढ़ते हुए, प्रमुख स्टील उत्पादक कंपनियां अपने कच्चे माल की सोर्सिंग और उत्पादन के तरीकों पर फिर से विचार कर रही हैं। वे स्क्रैप प्रोसेसिंग और ग्रीन टेक्नोलॉजी में भारी निवेश कर रही हैं।

  • Tata Steel: फिलहाल लगभग ₹203.20 पर ट्रेड कर रहा है, जिसका मार्केट कैप करीब ₹255,000 करोड़ है। पिछले एक साल में इसने सेंसेक्स से बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका P/E रेश्यो लगभग 27.7 है, जो सेक्टर के औसत 35.1 से कम है।
  • JSW Steel: करीब ₹1235.90 पर कारोबार कर रहा है, जिसका मार्केट कैप लगभग ₹302,000 करोड़ है। इसका P/E रेश्यो 40.5 है, जो थोड़ा ज्यादा है।
  • ArcelorMittal: वैश्विक स्तर पर इसका P/E रेश्यो लगभग 17.0 है।

कंपनियों की बड़ी डील्स और स्ट्रैटेजी

Tata Steel ने स्क्रैप रीसाइक्लिंग को एक अलग बिजनेस वर्टिकल बनाया है। कंपनी ने रोहतक में 0.5 मिलियन टन की एक प्लांट शुरू की है और लुधियाना में भी एक ग्रीन स्टील प्लांट जल्द ही शुरू होने वाला है। कंपनी पूर्वी भारत में आयरन ओर और कोयले का उपयोग करेगी, जबकि उत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत में लॉजिस्टिक्स और पर्यावरणीय अनुपालन (environmental compliance) को बेहतर बनाने के लिए रीसाइकल्ड स्क्रैप का इस्तेमाल करेगी। ArcelorMittal Nippon Steel India (AM/NS India) ने अपने कॉइल्स के लिए पहले ही उच्च स्टार रेटिंग हासिल कर ली है और जिंक व कॉपर जैसी अशुद्धियों की समस्या से निपटने के लिए अपनी स्क्रैप प्रोसेसिंग क्षमताओं का विस्तार करते हुए तीन नए सेंटर खोल रही है। JSW Steel अपने डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) प्लांट में हाइड्रोजन का इस्तेमाल कर रही है और महाराष्ट्र में 0.5 MTPA की स्क्रैप प्रोसेसिंग सुविधा स्थापित कर रही है, जिसका लक्ष्य 2030 तक कार्बन इंटेंसिटी को 42% तक कम करना है।

दुनिया भर में, स्टील स्क्रैप का उपयोग बढ़ने की उम्मीद है। 2030 तक 600 मिलियन टन स्क्रैप उपलब्ध होने का अनुमान है। हर टन स्क्रैप के इस्तेमाल से स्टील उत्पादन में लगभग 1.5 टन CO2 उत्सर्जन कम होता है। हालांकि, भारत में फिलहाल घरेलू स्क्रैप का उपयोग केवल 21-25% है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। भारत का लक्ष्य 2047 तक इसे 50% तक ले जाना है।

असली चुनौतियाँ: स्क्रैप की क्वालिटी और बढ़ी हुई लागत

सबसे बड़ी ऑपरेशनल चुनौती घरेलू स्टील स्क्रैप की क्वालिटी है। स्क्रैप में जिंक, कॉपर और पेंट जैसी अशुद्धियाँ (contaminants) होने की वजह से इसका प्रभावी ढंग से उपयोग करना मुश्किल हो जाता है। इसके कारण भारतीय हाई-टेक स्टील प्लांट्स को आयात पर बहुत अधिक निर्भर रहना पड़ता है। यह आयात निर्भरता सेक्टर को वैश्विक कीमत की अस्थिरता (price volatility) और सप्लाई चेन के जोखिमों (supply chain risks) के सामने ला खड़ा करती है, खासकर तब जब कई देश स्क्रैप के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की सोच रहे हैं। भारत के स्क्रैप उद्योग का खंडित (fragmented) और काफी हद तक असंगठित (unorganized) स्वरूप खराब पृथक्करण (segregation) और प्रोसेसिंग जैसी समस्याओं को और भी गंभीर बना देता है।

इसके अलावा, ग्रीन स्टील के उत्पादन में फिलहाल 30% से 54% तक का महत्वपूर्ण लागत प्रीमियम (cost premium) लगता है, हालांकि यह उम्मीद है कि टेक्नोलॉजी के बेहतर होने और कार्बन लागतें बढ़ने के साथ 2030 तक यह घटकर करीब $7 प्रति टन रह जाएगा। ऐसे उद्योग के लिए जो अक्सर तंग मार्जिन पर काम कर रहा है, यह प्रीमियम व्यापक रूप से इसे अपनाने में एक बड़ी बाधा है, खासकर छोटे खिलाड़ियों या उन लोगों के लिए जो परिष्कृत रीसाइक्लिंग प्रक्रियाओं में पूरी तरह से एकीकृत नहीं हैं।

भविष्य की राह

इन चुनौतियों के बावजूद, सरकार का इरादा बिल्कुल स्पष्ट है। सरकार की टैक्सोनॉमी और PSU खरीद नीति को क्लीनर टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी निवेश के जोखिम को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे ग्रीन स्टील के लिए एक गारंटीकृत घरेलू बाजार तैयार हो सके। JSW Steel जैसी कंपनियां ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स का पायलट करके कम-कार्बन मार्ग (low-carbon pathways) के प्रति व्यापक उद्योग प्रतिबद्धता का संकेत दे रही हैं। 2070 तक भारत की नेट-जीरो महत्वाकांक्षाओं (net-zero ambitions) को पूरा करने के लिए स्टील सेक्टर का परिवर्तन आवश्यक है। इस दिशा में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उद्योग स्क्रैप क्वालिटी मैनेजमेंट में महारत हासिल कर पाता है या नहीं और टिकाऊ उत्पादन (sustainable production) की विकसित होती इकोनॉमिक्स को कितनी अच्छी तरह नेविगेट कर पाता है।

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