सरकारी खरीद से 'ग्रीन स्टील' को मिलेगा बूस्ट?
एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी खरीद में ग्रीन स्टील के लिए 26% का एक खास मैंडेट (mandate) लागू होने की संभावना है। इससे वित्त वर्ष 2030 तक केवल सरकारी प्रोजेक्ट्स से ही ग्रीन स्टील की सालाना 16 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) तक की मांग पैदा हो सकती है। यह पहल भारत के लिए प्रमाणित कम-कार्बन स्टील (low-carbon steel) का पहला बड़ा, निश्चित बाजार स्थापित कर सकती है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब सरकारी प्रोजेक्ट्स में हर साल लगभग 31.6 मिलियन टन स्टील इस्तेमाल होता है, जो कार्बन उत्सर्जन में बड़ा योगदान देता है।
रिपोर्ट में 28 स्टील उत्पादकों से इनपुट लिया गया है, जो कुल 88 MTPA क्रूड स्टील क्षमता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें से 93% उत्पादकों का कहना है कि वे प्रमाणित ग्रीन स्टील की आपूर्ति के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि एक स्पष्ट मैंडेट हो और पारदर्शी कॉस्ट-रिकवरी (cost-recovery) मैकेनिज्म, जैसे कि प्रीमियम, GST में छूट या कार्बन क्रेडिट ऑफसेट, स्थापित किए जाएं। खरीद एजेंसियां भी नीतिगत सहयोग मिलने पर इस पहल के लिए तैयार दिख रही हैं। यह कोशिश केंद्रीय बजट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बढ़ाए गए सार्वजनिक कैपिटल एक्सपेंडिचर (capital expenditure) के अनुरूप है।
लागत और निर्भरता की बड़ी चुनौतियां
भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक है, लेकिन फिलहाल उसका स्टील सेक्टर दुनिया के सबसे कार्बन-उत्सर्जक (carbon-intensive) क्षेत्रों में से एक है। देश का स्टील उत्पादन मुख्य रूप से कोयले पर आधारित ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF) रूट से होता है। इसकी वजह से हर टन क्रूड स्टील पर 2.55 टन CO2 का उत्सर्जन होता है, जो ग्लोबल एवरेज से काफी ज्यादा है। ग्रीन स्टील, जिसमें ग्रीन हाइड्रोजन-आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (H2-DRI) और रिन्यूएबल एनर्जी से चलने वाले इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) जैसी तकनीकें शामिल हैं, उत्सर्जन को 97% तक कम करने का वादा करती हैं।
लेकिन, इस बदलाव की आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) एक बड़ी चिंता है। फिलहाल ग्रीन स्टील की कीमत पारंपरिक स्टील से 20-40% ज्यादा है। वर्तमान में यह प्रीमियम लगभग $210 प्रति टन है, जो निर्माण परियोजनाओं की लागत बढ़ा सकता है। हालांकि, अनुमान है कि तकनीकी प्रगति और इकोनॉमीज़ ऑफ स्केल (economies of scale) के कारण वित्त वर्ष 2030 तक यह प्रीमियम नाटकीय रूप से घटकर सिर्फ $7 प्रति टन रह जाएगा। ग्रीन हाइड्रोजन की ऊंची लागत ($4-$7 प्रति किलो) इस प्रीमियम का मुख्य कारण है। इसके अलावा, यूरोपियन यूनियन का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भारत के स्टील एक्सपोर्ट पर बड़ा खतरा बन सकता है, अगर उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो यह एक्सपोर्ट लागत को अरबों डॉलर तक बढ़ा सकता है।
भविष्य की राह और समाधान
इस्पात मंत्रालय की 'ग्रीनिंग द स्टील सेक्टर इन इंडिया' रिपोर्ट और ड्राफ्ट नेशनल ग्रीन प्रोक्योरमेंट पॉलिसी जैसी पहलें इन चुनौतियों से निपटने के लिए बनाई गई हैं। सरकारी खरीद (Green Public Procurement - GPP) नीतियां मांग को बढ़ावा देने और सेक्टर को विश्वसनीयता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
हालांकि, महत्वाकांक्षी 16 MTPA की मांग के लक्ष्य में कई बाधाएं हैं। ग्रीन स्टील की ऊंची शुरुआती लागत (20-40% अधिक) भारतीय बाजार के लिए एक बड़ी चुनौती है, जब तक कि विधायी समर्थन और लागत-रिकवरी के ठोस तरीके न हों। इसके साथ ही, भारत का स्टील उद्योग अभी भी कोयले पर आधारित ब्लास्ट फर्नेस (BF) क्षमता में निवेश कर रहा है, जिससे 2030 तक क्षमता दोगुनी होने की योजना है। यह कार्बन लॉक-इन (carbon lock-in) और स्ट्रैंडेड एसेट्स (stranded assets) का जोखिम पैदा करता है। 87% से अधिक लौह-निर्माण क्षमता और विकास के अधीन 90% क्षमता कोयले पर निर्भर है।
पर्याप्त नीतिगत हस्तक्षेप, वित्तीय प्रोत्साहन और 'ग्रीन स्टील' के लिए एक स्पष्ट, लागू करने योग्य नियामक ढांचे के बिना, मैंडेट के महत्वाकांक्षी मांग लक्ष्य मुश्किल साबित हो सकते हैं।
उम्मीद की किरण
इन मौजूदा चुनौतियों के बावजूद, भारत में ग्रीन स्टील का भविष्य उज्ज्वल दिखता है। ग्रीन हाइड्रोजन की गिरती लागत और पारंपरिक स्टील पर बढ़ते कार्बन प्राइसिंग (carbon pricing) से 2030 तक लागत का अंतर काफी कम हो जाएगा, जिससे ग्रीन स्टील आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो जाएगा, और संभवतः 2035 तक सस्ता भी। बढ़ता वैश्विक ग्रीन स्टील बाजार और 2070 तक भारत के नेट-जीरो (net-zero) लक्ष्य को पूरा करने की अनिवार्यता, लगातार निवेश और नीति विकास के लिए मजबूत प्रेरक हैं। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन जैसी सरकारी पहलें महत्वपूर्ण प्रवर्तक (enablers) हैं। अगर प्रस्तावित 26% ग्रीन स्टील मैंडेट को स्पष्ट नीति परिभाषाओं, वित्तीय प्रोत्साहनों और मजबूत निगरानी तंत्र के साथ सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो यह भारत के कम-कार्बन स्टील सेक्टर में परिवर्तन को गति देने और इसकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक (catalyst) साबित हो सकता है।