भारत की GVCs में 'सुपरपावर' बनने की चाह: क्या हकीकत में बदलेंगे सपने?

INDUSTRIAL-GOODSSERVICES
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
भारत की GVCs में 'सुपरपावर' बनने की चाह: क्या हकीकत में बदलेंगे सपने?
Overview

भारत ग्लोबल वैल्यू चेन्स (GVCs) में सिर्फ एक असेंबली हब बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि 'रणनीतिक रूप से अपरिहार्य' (strategically indispensable) बनने का बड़ा लक्ष्य रखता है। इसका मतलब है कि दुनिया की सप्लाई चेन में अपनी ऐसी खास जगह बनाना जिसे आसानी से बदला न जा सके। लेकिन, Economic Survey 2025-26 के अनुसार, इस महत्वाकांक्षी सपने को हकीकत बनाने की राह में कई गंभीर बाधाएँ हैं।

Economic Survey 2025-26 के अनुसार, भारत ग्लोबल वैल्यू चेन्स (GVCs) में अपनी भूमिका को एक नए स्तर पर ले जाना चाहता है। इसका लक्ष्य सिर्फ प्रोडक्शन या असेंबली तक सीमित रहना नहीं, बल्कि 'ऊँचे मूल्य वाले कामों' (higher-value tasks) में आगे बढ़कर 'रणनीतिक रूप से अपरिहार्य' (strategically indispensable) बनना है। आज की GVCs इंडस्ट्री के बजाय, अलग-अलग 'टास्क' या कामों में बंटी हुई हैं। असली वैल्यू सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में नहीं, बल्कि सिस्टम इंटीग्रेशन जैसे ख़ास कामों में है, जो सप्लाई चेन के 'क्रिटिकल चोक पॉइंट' बन जाते हैं।

लेकिन इस 'अपरिहार्यता' तक पहुँचने का रास्ता काफी मुश्किल है। भारत की GVCs में मौजूदा भागीदारी, खासकर 'बैकवर्ड लिंकेजेस' (backward linkages) यानी आयातित कंपोनेंट्स को एक्सपोर्ट प्रोडक्शन में इस्तेमाल करने की क्षमता, काफी कमज़ोर है। Economic Survey 2025-26 के मुताबिक, यह दर सिर्फ 17.2% है। इसके विपरीत, वियतनाम और चीन जैसे देश दशकों से सोची-समझी इंडस्ट्रियल पॉलिसी और निवेश के ज़रिए GVCs में अपनी जड़ें जमा चुके हैं। वियतनाम ने तो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) का फायदा उठाकर अपने एक्सपोर्ट को इतनी ऊंचाई पर पहुंचा दिया है कि भारत अभी उस स्तर से काफी पीछे है, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में।

जबकि भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट करने का लक्ष्य रखती हैं, एशिया के कई देशों की तुलना में GVCs में भारत की कुल भागीदारी अभी भी मामूली है। भारत का एक्सपोर्ट भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन GVCs में उसकी हिस्सेदारी उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ी है। भारत अक्सर 'फॉरवर्ड लिंकेजेस' (forward linkages) पर ज़्यादा निर्भर रहता है, यानी कच्चे माल या बेसिक इनपुट को एक्सपोर्ट करना, न कि इम्पोर्टेड कंपोनेंट्स को जोड़कर ज़्यादा वैल्यू वाले प्रोडक्ट बनाना। दूसरी ओर, भारत की ट्रेड पॉलिसी कुछ हद तक 'प्रोडक्शनिस्ट' (protectionist) है, जहाँ वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले टैरिफ ऊँचे हैं और उनके पास ज़्यादा गहरे FTAs हैं। इस वजह से, भारत का बड़ा घरेलू बाज़ार और श्रम शक्ति होने के बावजूद, GVCs को अपनी ओर आकर्षित करना एक चुनौती बना हुआ है। कॉम्पिटिटिवनेस इंडेक्स में भी भारत, मलेशिया, वियतनाम और थाईलैंड जैसे प्रमुख एशियाई देशों से पिछड़ा हुआ है।

'रणनीतिक अपरिहार्यता' के लक्ष्य को पाने के लिए कई बड़ी संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना होगा। सबसे प्रमुख समस्या है हमारे 'बैकवर्ड लिंकेजेस' का कमज़ोर होना, जिसका सीधा मतलब है कि हम इम्पोर्टेड इंटरमीडिएट गुड्स और कंपोनेंट्स को एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड प्रोडक्शन में प्रभावी ढंग से इंटीग्रेट नहीं कर पाते। इससे एक मज़बूत डोमेस्टिक सप्लायर इकोसिस्टम का विकास बाधित होता है। इसके अलावा, आज के दौर की मैन्युफैक्चरिंग में डिज़ाइन, लॉजिस्टिक्स, फाइनेंस और डेटा सपोर्ट जैसी सर्विसेज का जुड़ा होना ज़रूरी है। इन सर्विसेज को अपनी इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी का मज़बूत हिस्सा बनाना अभी भी एक अधूरा काम है। भारत की डिजिटल सर्विसेज में अच्छी पकड़ है, पर इसे GVCs में गहराई से उतारने के लिए सिर्फ पार्टिसिपेट करने से कहीं ज़्यादा की ज़रूरत है। घने 'इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स' (industrial clusters) बनाना भी एक चुनौती है, जिसके लिए सुनियोजित क्षेत्रीय विकास, जिसमें हाउसिंग और ट्रांसपोर्ट जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर को इंडस्ट्री के साथ जोड़ा जाए, आवश्यक है। हमारे Tier-2 और Tier-3 सप्लायर बेस का बिखरा हुआ होना, कॉम्पिटिटर देशों के मुकाबले, भारत की GVCs को मज़बूत आधार देने की क्षमता को सीमित करता है। लेबर मार्केट की कठोरताएँ और स्किल गैप्स भी हमें ज़्यादा एडवांस मैन्युफैक्चरिंग टास्क की ओर बढ़ने से रोक रहे हैं।

आगे का रास्ता एक 'एडैप्टिव, प्रॉब्लम-सॉल्विंग' इंडस्ट्रियल पॉलिसी से होकर गुज़रता है। Economic Survey 2025-26 रेगुलेटरी कोहेरेंस, लॉजिस्टिक्स एफिशिएंसी और R&D व स्किल्स में लगातार निवेश की ज़रूरत पर बल देता है। हमें इंडस्ट्रियल पॉलिसी को एक निरंतर चलने वाले फंक्शन के रूप में देखना होगा, न कि किसी एक बार के हस्तक्षेप के तौर पर। फोकस इस बात पर होना चाहिए कि फर्मों को जटिल टास्क 'इंटरनलाइज़' (internalize) करने में कैसे मदद की जाए, न कि सिर्फ आउटपुट बढ़ाने पर। सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम ऐसी क्षमताएँ कैसे विकसित करते हैं जो भारत को केवल 'पार्टिसिपेशन' से 'वास्तविक अपरिहार्यता' की ओर ले जाएं। इसके लिए क्षमताओं को अपग्रेड करना, टेक्नोलॉजिकल बदलावों का अनुमान लगाना और उन्हें मैनेज करना, और सबसे महत्वपूर्ण, पॉलिसी की प्रेडिक्टेबिलिटी और 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' (ease of doing business) को बेहतर बनाना ज़रूरी है, जो अब तक GVC निवेश को आकर्षित करने में बड़ी बाधाएँ रही हैं। अंततः, भारत की असली परीक्षा यह होगी कि वह कैसा माहौल बना पाता है जहाँ उसके बिज़नेस न केवल कुशलता से उत्पादन कर सकें, बल्कि ग्लोबल प्रोडक्शन नेटवर्क्स के इस जटिल और लगातार बदलते ताने-बाने में स्थायी वैल्यू भी हासिल कर सकें।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.