भारत की प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग टैलेंट को बढ़ावा
यह पहल भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत करने की राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है। इस सेंटर का उद्देश्य देश की बढ़ती जरूरतों को पूरा करना है, खासकर उन सेक्टर्स में जो 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और आत्मनिर्भर भारत (self-reliance) के प्रयासों के लिए बेहद अहम हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग (funding) की कोई सीमा नहीं रखी गई है, जो देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को ग्लोबल लेवल पर कंपीटिटिव बनाने के सरकार के इरादे को साफ दिखाता है।
ग्लोबल स्किल्स स्टैंडर्ड्स का लक्ष्य
यह नया सेंटर भारत में मौजूद स्किल गैप (skill gap) को पाटने के लिए खोला जा रहा है। इंडस्ट्री में प्रिसिजन इंजीनियरिंग (precision engineering), ऑटोमेशन (automation) और डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग (digital manufacturing) जैसे क्षेत्रों में एक्सपर्ट्स की भारी कमी है। GSV का लक्ष्य अपनी ट्रेनिंग को जर्मनी (Germany), अमेरिका (U.S.) और जापान (Japan) जैसे देशों के हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग ट्रेनिंग स्टैंडर्ड्स के बराबर लाना है। उदाहरण के लिए, जर्मनी अपने प्रैक्टिकल स्किल्स (practical skills) और अप्रेंटिसशिप (apprenticeships) पर जोर देने वाले डुअल वोकेशनल सिस्टम (dual vocational system) के लिए जाना जाता है। वहीं, जापान भी हाई-टेक एरियाज (high-tech areas) में अपने मजबूत वोकेशनल स्टैंडर्ड्स के लिए प्रसिद्ध है। GSV, Tata Indian Institute of Skills (TIIS) और IIT Madras के रिसर्च सेंटर्स (research centers) जैसे सफल मॉडल्स से प्रेरणा लेकर इस क्वालिटी और इंडस्ट्री फोकस (industry focus) को हासिल करने की कोशिश करेगा।
नए सेंटर के सामने चुनौतियाँ
अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद, GSV सेंटर को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। 'मेक इन इंडिया' जैसी पिछली राष्ट्रीय पहलों ने दिखाया है कि सिर्फ पॉलिसी बनाना काफी नहीं होता, बल्कि लक्ष्यों को हासिल करने में मुश्किलें आती हैं। मैन्युफैक्चरिंग का जीडीपी (GDP) में योगदान उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ा है। इसलिए, GSV को योजनाओं को अमल में लाने में आने वाली बाधाओं को दूर करना होगा। जर्मनी या जापान जैसे देशों की ट्रेनिंग की गहराई से बराबरी करने के लिए सिर्फ नए कोर्सेज शुरू करना ही काफी नहीं होगा, बल्कि प्रिसिजन (precision), क्वालिटी (quality) और निरंतर इम्प्रूवमेंट (improvement) की सोच को पूरे सिस्टम में लाना होगा। इसके अलावा, स्किल्ड वर्कर्स (skilled workers) के लिए कॉम्पिटिशन भी बढ़ रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और डिफेंस जैसे सेक्टर्स मेकाट्रॉनिक्स (Mechatronics), रोबोटिक्स (Robotics), एआई (AI) और डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग जैसे स्पेशलाइज्ड स्किल्स वाले एक्सपर्ट्स की तलाश में हैं। हाई-प्रिसिजन वर्क के लिए स्पेशलाइज्ड स्किल्स को प्रभावी ढंग से डिलीवर करना कई भारतीय ट्रेनिंग प्रोग्राम्स के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इंडस्ट्री ग्रोथ और सेंटर की भूमिका
भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (manufacturing sector) ग्रोथ के लिए तैयार है, और अनुमान है कि 2035 तक यह देश की जीडीपी (GDP) का 25% तक हो सकता है। अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर का लक्ष्य 2030 तक $500 बिलियन के आउटपुट तक पहुंचना है, जिसके लिए 2027 तक लाखों नई नौकरियों की जरूरत होगी। एयरोस्पेस सेक्टर में भी स्किल्ड वर्कर्स की भारी मांग है। ऐसे में, GSV का नया सेंटर इन आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग टैलेंट का एक मजबूत सप्लाई चेन (supply chain) बनाकर, यूनिवर्सिटी का लक्ष्य इम्पोर्ट पर निर्भरता कम करना, लोकल प्रोडक्शन (local production) को बढ़ावा देना और भारत को एक प्रमुख ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग सेंटर (global manufacturing center) बनाना है। इस GSV सेंटर की सफलता, सरकारी योजनाओं को असली, हाई-क्वालिटी इंडस्ट्रियल रिजल्ट्स में बदलने की भारत की क्षमता का एक अहम पैमाना साबित होगी।