फास्टनर क्वालिटी रूल्स से छोटे कारोबारियों पर लागत का भूचाल! 'मेक इन इंडिया' को बड़ा झटका

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
फास्टनर क्वालिटी रूल्स से छोटे कारोबारियों पर लागत का भूचाल! 'मेक इन इंडिया' को बड़ा झटका
Overview

भारत में फास्टनर (Fasteners) इंडस्ट्री पर नए क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स (QCOs) का भारी असर दिख रहा है। छोटे कारोबारियों का कहना है कि इन नियमों के अनुपालन (Compliance) की लागत बहुत ज्यादा है, जिससे सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हो रही है। 'वन-प्रोडक्ट-वन-लाइसेंस' जैसे नियम **₹1 लाख** प्रति लाइसेंस और **₹30-40 लाख** तक टेस्टिंग लैब्स पर खर्च करवा रहे हैं, जिससे 'मेक इन इंडिया' (Make in India) योजना को भी झटका लग रहा है।

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लागत का भारी बोझ

नए क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स (QCOs) का पालन करना फास्टनर कंपनियों के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बन गया है। इंडस्ट्री के अनुसार, हर एक प्रोडक्ट के लिए ₹1 लाख तक का लाइसेंसिंग खर्च आ रहा है। वहीं, अपनी टेस्टिंग लैब्स स्थापित करने की लागत ₹30-40 लाख तक पहुंच सकती है। यह छोटी और मझोली कंपनियों (MSMEs) के लिए काफी ज्यादा है, जिनके पास सीमित पूंजी होती है।

इंडस्ट्री पर असर

लाइसेंसिंग और टेस्टिंग की बढ़ती इन लागतों के चलते कुछ विदेशी सप्लायर्स भारतीय बाजार से बाहर हो गए हैं। इससे स्पेशलाइज्ड पार्ट्स की उपलब्धता कम हो गई है और बचे हुए सर्टिफाइड फर्म्स कीमतें बढ़ा रहे हैं। नतीजतन, ऑटोमोटिव और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम सेक्टरों के लिए इनपुट कॉस्ट (Input Costs) बढ़ रहा है, जो 'मेक इन इंडिया' (Make in India) पहल के बिल्कुल विपरीत है।

'एक प्रोडक्ट, एक लाइसेंस' नियम की परेशानी

'वन-प्रोडक्ट-वन-लाइसेंस' (One-product-one-license) का नियम इंडस्ट्री की असलियत से मेल नहीं खाता। कई निर्माता एक ही मशीनरी का इस्तेमाल करके दर्जनों वेरिएंट्स (Variants) को छोटे बैचेस (Batches) में बनाते हैं। यह कठोर नियम डुप्लिकेट लाइसेंसिंग और प्रोडक्ट्स को बाजार में लाने में भारी देरी का कारण बन सकता है।

टेस्टिंग पर भारी खर्च

लाइसेंसिंग के अलावा, टेस्टिंग का खर्च भी चौंकाने वाला है। हर वेरिएंट की टेस्टिंग पर ₹22,000 से ₹25,000 तक का खर्च आ रहा है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ 29 स्क्रू सैंपल के एक बैच की टेस्टिंग पर ही करीब ₹16.5 लाख का खर्च आया, जो एक पूरी टेस्टिंग लैब बनाने की लागत के बराबर है। दुनियाभर में फास्टनर स्टैंडर्ड्स ISO और DIN जैसी संस्थाएं तय करती हैं, लेकिन भारत का ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) सर्टिफिकेशन प्रोसेस एक बड़ी बाधा साबित हो रहा है। गौबा कमेटी (Gauba Committee) और डायरेक्टर जनरल ऑफ ट्रेड रेमेडीज (DGTR) की सिफारिशों के बावजूद अभी तक पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

सरकार कर रही है समीक्षा

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार इन QCOs की समीक्षा कर रही है, खासकर स्टील से जुड़े सेक्टरों के लिए। इसमें नियमों को पूरी तरह रद्द करने के बजाय 'कैलिब्रेटेड रिलैक्सेशन' (Calibrated Relaxation) यानी सोच-समझकर ढील देने पर विचार किया जा रहा है। यह कदम इंडस्ट्री के भारी दबाव के बाद आया है। हालांकि, नियमों को पूरी तरह से वापस लेने की संभावना कम है, लेकिन प्रोसीजरल रिलैक्सेशन (Procedural Relaxation) और डेडलाइन एक्सटेंशन (Deadline Extension) पर विचार हो रहा है, खासकर उन फर्मों के लिए जो क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा कर रही हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.