FY26 में 60 प्रोजेक्ट्स के ज़रिए आए $6.1 बिलियन के इस निवेश का सीधा मतलब है कि विदेशी कंपनियां भारत में न केवल पैसा लगा रही हैं, बल्कि वे बड़े सौदों (deals) में भी रुचि दिखा रही हैं। खास बात यह है कि ऐसे सौदों का औसत आकार (average deal size) पिछले साल के मुकाबले 1.8 गुना तक बढ़ गया है। यह दिखाता है कि एफडीआई (FDI) अब छोटी-मोटी डील्स से निकलकर बड़े, रणनीतिक निवेशों की ओर बढ़ रहा है।
इस निवेश में यूरोपीय देशों का दबदबा रहा, लेकिन यूनाइटेड स्टेट्स, जापान, साउथ कोरिया, और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी ज़ोरदार भागीदारी की। इतना ही नहीं, ब्राज़ील, न्यूजीलैंड, और कनाडा जैसे उभरते बाज़ारों से भी निवेश आया, जिसने निवेशक आधार को और भी विविध (diverse) बना दिया है।
कुल एफडीआई (FDI) का करीब 65% हिस्सा केमिकल्स, फार्मास्युटिकल्स, बायोटेक्नोलॉजी, और फूड प्रोसेसिंग जैसे सेक्टर्स में आया। इसके अलावा, ईएसडीएम (इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिजाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग), एयरोस्पेस, और ऑटोमोटिव जैसे सेक्टर्स में भी अच्छी खासी हलचल देखने को मिली।
DPIIT सेक्रेटरी अमरदीप सिंह भाटिया ने बताया कि भारत की स्पष्ट नीतियां (policy clarity), संस्थागत प्रतिबद्धता (institutional commitment) और मजबूत रेगुलेटरी एनवायरनमेंट (regulatory environment) विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। देश की अनुमानित 6.9% की जीडीपी ग्रोथ और फाइनेंशियल ईयर 25-26 के लिए 7.5%-7.8% की ग्रोथ का अनुमान भी एक स्थिर आर्थिक माहौल दे रहा है।
हालांकि, भारत के सामने वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों से कड़ा कॉम्पिटिशन (competition) है, जो मैन्युफैक्चरिंग में निवेश के लिए कम लागत का फायदा उठा रहे हैं। कुछ सेक्टर्स में अत्यधिक निवेश से ऐसेक्टर्स में गिरावट या रेगुलेटरी बदलावों का खतरा बढ़ सकता है। बड़े प्रोजेक्ट्स को राज्यों में समान रेगुलेटरी सपोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत होगी।
FY25-26 के लिए कुल एफडीआई (FDI) $90 बिलियन से अधिक रहने की उम्मीद है। सरकार ईएसडीएम, रिन्यूएबल एनर्जी, और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे हाई-इम्पैक्ट सेक्टर्स पर ख़ास ध्यान दे रही है।
