भारत की EV क्रांति पर सवाल? क्रिटिकल मिनरल्स पॉलिसी के सामने बड़ी चुनौतियां

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत की EV क्रांति पर सवाल? क्रिटिकल मिनरल्स पॉलिसी के सामने बड़ी चुनौतियां
Overview

भारत अपनी इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए एक अहम क्रिटिकल मिनरल्स पॉलिसी पर काम कर रहा है. इस पॉलिसी का मकसद निकेल (Nickel) और लिथियम (Lithium) जैसे ज़रूरी खनिजों की डोमेस्टिक प्रोसेसिंग को बढ़ाना है, ताकि इंपोर्ट पर निर्भरता कम हो सके. हालांकि, इस सेल्फ-रिलायंस (Self-Reliance) के रास्ते में भारी पूंजी निवेश, टेक्नोलॉजी की कमी और कड़ा ग्लोबल कॉम्पिटिशन जैसी बड़ी रुकावटें खड़ी हैं.

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डोमेस्टिक मिनरल्स प्रोडक्शन को बड़ा झटका

भारत अपनी इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और बैटरी इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण खनिजों के डोमेस्टिक प्रोसेसिंग को मजबूत करने के लिए एक की-पॉलिसी लागू करने की तैयारी में है. माइन्स मिनिस्ट्री (Mines Ministry) के नेतृत्व में, इस स्ट्रेटेजिक कदम का मकसद निकेल (Nickel) और लिथियम (Lithium) जैसे एसेंशियल रिसोर्सेज पर देश की भारी इंपोर्ट डिपेंडेंसी को कम करना है. माइन्स सेक्रेटरी पीयूष गोयल (Piyush Goyal) ने संकेत दिया है कि पॉलिसी एडवांस स्टेज में है, और शुरुआत में हाई-एंड EVs के लिए निकेल और बैटरी प्रोडक्शन के लिए लिथियम पर फोकस किया जाएगा. यह इनिशिएटिव तेजी से बदलते ग्लोबल मार्केट के बीच सप्लाई चेन्स को मजबूत करने के राष्ट्रीय प्रयास को दिखाता है. हालांकि, ऐसी फाउंडेशनल इंडस्ट्री बनाने में कई जटिल चुनौतियां हैं.

मुख्य चुनौतियां: फंडिंग, टेक, और ग्लोबल कॉम्पिटिशन

इन खनिजों के लिए एक फुल प्रोसेसिंग वैल्यू चेन (Value Chain) डेवलप करना बड़ी बाधाएं खड़ी करता है. मजबूत रिफाइनिंग कैपेसिटी बनाने के लिए पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) और प्राइवेट कंपनियों, दोनों से ही काफी पूंजी निवेश (Capital Investment) की जरूरत है. मिनरल ऑक्शन से लेकर एक्चुअल प्रोडक्शन तक का रास्ता बहुत लंबा है. दुनिया भर में, चीन कई क्रिटिकल मिनरल्स के प्रोसेसिंग में 60-70% हिस्सेदारी रखता है, जिससे बाजार पर उसका जबरदस्त कंट्रोल है. इस कंसंट्रेशन से उसे काफी जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) और इकोनॉमिक (Economic) इन्फ्लुएंस मिलता है, जैसा कि हाल ही में ग्रेफाइट और रेयर अर्थ्स पर उसके एक्सपोर्ट कंट्रोल से देखा गया.

यह पॉलिसी प्रोसेसेज को सिंपलीफाई करने का लक्ष्य रखती है, लेकिन महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजिकल बैरियर्स मौजूद हैं, खासकर इस्तेमाल की गई लिथियम-आयन बैट्रीज़ से निकलने वाले 'ब्लैक मास' (Black Mass) रेसिड्यू से वैल्यू एक्सट्रैक्ट करने में. हालांकि रिसाइक्लिंग (Recycling) इंपोर्ट डिपेंडेंसी को कम करने का एक तरीका है, लेकिन इसके लिए आवश्यक एडवांस्ड प्रोसेसिंग कैपेबिलिटीज (Advanced Processing Capabilities) दुर्लभ हैं और अक्सर कुछ ग्लोबल कंपनियों के पास ही होती हैं. उदाहरण के लिए, मौजूदा मेथड्स का उपयोग करके ब्लैक मास से लिथियम को रिकवर करना, निकेल, कोबाल्ट या कॉपर को रिकवर करने से ज्यादा टेक्निकली मुश्किल है. ग्लोबल फोरकास्ट के मुताबिक, 2035 तक रिसाइक्लिंग से क्रिटिकल मिनरल्स का 15% सप्लाई हो सकता है, जो कि मौजूदा दर से दोगुना से भी ज्यादा है, यह भारत के पोटेंशियल अवसर को दर्शाता है अगर इन टेक्नोलॉजी गैप्स को भरा जा सके.

EV मार्केट ग्रोथ से डिमांड बढ़ी, ग्लोबल स्क्रेम्बल जारी

भारतीय EV मार्केट में काफी ग्रोथ की उम्मीद है, जिसका साइज 2026 तक $31.09 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, और यह 2035 तक 52.56% CAGR की दर से बढ़ेगा. EVs की इस बढ़ती डिमांड के कारण क्रिटिकल मिनरल्स की जरूरत सीधे तौर पर बढ़ रही है. लिथियम कार्बोनेट (Lithium Carbonate) की कीमतें 2026 की शुरुआत में सप्लाई डेफिसिट (Supply Deficit) की उम्मीदों से तेजी से बढ़ी हैं, जो $22,970 प्रति मीट्रिक टन के आसपास ट्रेड कर रही हैं. 2026 में 22,000 से 80,000 मीट्रिक टन तक के डेफिसिट का अनुमान है. वहीं, निकेल (Nickel) की कीमतें 2026 की शुरुआत में $16,000 से $18,000 प्रति टन के बीच रही हैं. यह वोलेटिलिटी (Volatility) इंडोनेशियाई सप्लाई कोटा (Indonesian Supply Quotas) और बैटरी और स्टेनलेस स्टील सेक्टर से घटती डिमांड से प्रभावित है, हालांकि सप्लाई कंट्रोल्स से इसे सपोर्ट मिल रहा है. गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का अनुमान है कि 2026 में निकेल का औसत भाव $17,200 प्रति टन रह सकता है.

वैश्विक स्तर पर, अमेरिका (US) और यूरोपियन यूनियन (EU) चीन के दबदबे को चुनौती देने के अपने प्रयासों को बढ़ा रहे हैं, प्राइवेट कंपनियों को इक्विटी स्टेक (Equity Stakes) और फाइनेंसिंग से सपोर्ट कर रहे हैं, ताकि सप्लाई चेन्स को डाइवर्सिफाई किया जा सके और डोमेस्टिक प्रोसेसिंग और रिसाइक्लिंग कैपेसिटीज स्थापित की जा सकें. भारत की स्ट्रैटेजी में डोमेस्टिक प्रोडक्शन को मजबूत करना और संसाधन-संपन्न देशों के साथ इंटरनेशनल पार्टनरशिप (International Partnerships) शामिल है, जैसे कि एमओयू (MoUs). हालिया सरकारी बजट उपायों में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट कॉरिडोर (Rare Earth Permanent Magnet Corridors) और क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग के लिए इंपोर्ट ड्यूटी में छूट पर फोकस किया गया है, ताकि इस वैल्यू चेन डेवलपमेंट को स्पीड अप किया जा सके. हालांकि, भारत को माइन डेवलपमेंट (Mine Development) में लंबे समय, औसतन 18 साल का सामना करना पड़ता है.

मेजर रिस्क: एग्जीक्यूशन हर्डल्स और इंपोर्ट डिपेंडेंसी

नीति प्रगति और भारत के EV लक्ष्यों के लिए लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे मिनरल्स के महत्वपूर्ण होने के बावजूद, बड़े रिस्क बने हुए हैं. क्रिटिकल मिनरल्स, जिसमें लिथियम, कोबाल्ट और निकेल शामिल हैं, के लिए भारत की 100% इंपोर्ट निर्भरता इसे ग्लोबल सप्लाई इश्यूज और प्राइस स्विंग्स के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है. हालांकि भारत ने जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) में लिथियम के भंडार खोजे हैं, लेकिन कमर्शियल प्रोडक्शन में अभी कई साल लगेंगे. इसके अलावा, एमओयू (MoUs) के माध्यम से कच्चे माल के लिए विदेशी देशों पर निर्भरता जियोपॉलिटिकल रिस्क लाती है.

टेक्नोलॉजिकल गैप, खासकर एफिशिएंट 'ब्लैक मास' रिसाइक्लिंग में, एक मेजर वीक स्पॉट है. हालांकि रिसाइक्लिंग को एक समाधान के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन आवश्यक एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज दुर्लभ हैं और काफी हद तक कुछ ही एंटिटीज द्वारा नियंत्रित की जाती हैं, जिससे नई डिपेंडेंसी पैदा हो सकती है. चीन की प्रोसेसिंग में 60-70% की स्थापित पोजीशन कड़ी प्रतिस्पर्धा पेश करती है. माइनिंग, एक्सट्रैक्शन और रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने के लिए आवश्यक भारी पूंजी, साथ ही 'ऑक्शन टू प्रोडक्शन' टाइमलाइन की लंबी अवधि, एग्जीक्यूशन को मुश्किल बनाती है. माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट (Mines and Minerals (Development and Regulation) Act) के तहत पिछले सुधारों का उद्देश्य प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देना था, लेकिन वे स्ट्रक्चरल और रेगुलेटरी हर्डल्स का सामना कर रहे हैं.

आगे का रास्ता: सेल्फ-रिलायंस की ओर लंबा सफर

एनालिस्ट्स भारत की क्रिटिकल मिनरल्स पॉलिसी को एनर्जी इंडिपेंडेंस (Energy Independence) और इंडस्ट्रियल ग्रोथ (Industrial Growth) की दिशा में एक आवश्यक कदम मानते हैं, लेकिन इसकी सफलता प्रमुख चुनौतियों से पार पाने पर निर्भर करेगी. 2030 तक EV पेनिट्रेशन (EV Penetration) के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य सुरक्षित मिनरल एक्सेस की मांग करते हैं. नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) का लक्ष्य डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन, प्रोसेसिंग और रिसाइक्लिंग को सपोर्ट करके इन मुद्दों को हल करना है, जिसे सरकारी और PSU इन्वेस्टमेंट का समर्थन प्राप्त है. पॉलिसी को हकीकत में बदलने के लिए लगातार कैपिटल इन्फ्यूजन (Capital Infusion), तेज टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट और स्ट्रेटेजिक इंटरनेशनल कोलैबोरेशन (Strategic International Collaborations) की आवश्यकता होगी. क्रिटिकल मिनरल्स वैल्यू चेन में एक मेजर प्लेयर बनना एक लंबी प्रक्रिया होगी जिसमें सावधानीपूर्वक एग्जीक्यूशन और डायनामिक ग्लोबल मार्केट कंडीशंस के अनुकूल होने की आवश्यकता होगी.

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