भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) की बढ़ती रफ्तार के साथ ही लिथियम जैसे अहम मिनरल्स का इम्पोर्ट (Import) आसमान छू रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2018 में जहां यह सिर्फ ₹3,532 करोड़ था, वहीं फाइनेंशियल ईयर 2026 के पहले ग्यारह महीनों में यह बढ़कर ₹37,624.6 करोड़ तक पहुंच गया। यानी करीब दस गुना की भारी बढ़ोतरी! यह उछाल EVs, एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ती मांग का सीधा नतीजा है। हालांकि, देश में EV सेल्स 2025 तक 202,000 यूनिट्स (कुल नई गाड़ियों की बिक्री का करीब 4%) तक पहुंचने का अनुमान है, लेकिन ग्लोबल EV प्रोडक्शन में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम है। EV बैटरी की मांग 2025 में 20 GWh से बढ़कर 2032 तक 200 GWh होने की उम्मीद है, लेकिन देश में एडवांस बैटरी सेल्स और क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग की क्षमता अभी काफी कम विकसित है। 2025 में अकेले लिथियम इम्पोर्ट $1.2 बिलियन तक पहुंच गया, जिसका बड़ा हिस्सा चीन और चिली से आता है।
घरेलू बैटरी इकोसिस्टम बनाने के लिए सरकार ने ₹18,100 करोड़ की एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, ₹34,300 करोड़ की नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन और ₹1,500 करोड़ की क्रिटिकल मिनरल रीसाइक्लिंग इंसेंटिव स्कीम जैसे बड़े कदम उठाए हैं। लेकिन, इन पहलों पर प्रगति धीमी रही है। अक्टूबर 2025 तक, ACC PLI स्कीम के तहत 50 GWh के लक्ष्य का केवल 2.8% (यानी 1.4 GWh) क्षमता ही चालू हुई है, वो भी सिर्फ Ola Electric द्वारा। इस आंशिक शुरुआत से भी अभी इंसेंटिव क्लेम करने के लिए जरूरी डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन की शर्तें पूरी नहीं हुई हैं। नतीजतन, अक्टूबर 2025 तक ₹29 अरब के टारगेट के बावजूद किसी भी लाभार्थी को कोई इंसेंटिव नहीं मिला है।
Ola Electric, Reliance New Energy और Rajesh Exports जैसे लाभार्थियों ने अपनी PLI टारगेट्स में एक साल का एक्सटेंशन (Extension) मांगा है। उन्होंने सप्लाई चेन में रुकावटों, खासकर चीन से उपकरण मिलने में देरी का हवाला दिया है। Ola Electric ने अपनी विस्तार योजनाओं को भी घटाकर FY2029 तक 5 GWh कर दिया है, जो पहले आवंटित 20 GWh से काफी कम है। राजेश एक्सपोर्ट्स ने भी अभी सिर्फ अपनी जमीन का अधिग्रहण पूरा किया है। प्रोडक्शन बढ़ाने में हो रही इन देरी की वजह से भारत लिथियम और बैटरी कंपोनेंट्स के इम्पोर्ट पर बुरी तरह निर्भर बना हुआ है, जिसका एक बड़ा हिस्सा चीन-लिंक्ड सप्लाई चेन से आता है।
भारत का बैटरी मैन्युफैक्चरिंग में निवेश दुनिया के दिग्गजों के मुकाबले काफी कम है। 2025-2026 के अनुमानित निवेश में भारत का हिस्सा केवल $1.7 बिलियन (ग्लोबल शेयर का 0.9%) है, जबकि चीन $130.6 बिलियन (ग्लोबल शेयर का 71%) के साथ सबसे आगे है। इसके बाद यूरोप ($20.2 बिलियन, 11%) और अमेरिका ($18.4 बिलियन, 10%) का नंबर आता है। ग्लोबल बैटरी प्रोडक्शन में चीन का दबदबा 70% से अधिक है, जिसमें CATL और BYD जैसी कंपनियां प्रमुख हैं। साउथ कोरिया के पास करीब 15% ग्लोबल क्षमता है। माइनिंग (Mining), प्रोसेसिंग (Processing) और मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) का यह कंसंट्रेशन (Concentration) भारत को भू-राजनीतिक जोखिमों (Geopolitical Risks), कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई में संभावित रुकावटों के प्रति संवेदनशील बनाता है। चीन दुनिया की 75-80% लिथियम रिफाइनिंग क्षमता को भी नियंत्रित करता है।
भारत में लिथियम के बड़े रिजर्व्स (Reserves) होने का अनुमान है, खासकर जम्मू और कश्मीर में 5.9 मिलियन टन। लेकिन, व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य एक्सट्रैक्शन (Extraction) में अभी कई बाधाएं हैं, और डिस्कवरी (Discovery) से प्रोडक्शन तक में चार से सात साल लग सकते हैं।
दूसरी ओर, बैटरी रीसाइक्लिंग (Recycling) क्षेत्र में भारत का प्रदर्शन अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसमें काफी संभावनाएं हैं। देश वर्तमान में अपने इस्तेमाल किए गए लिथियम-आयन बैटरी का केवल 1% ही रीसायकल कर पाता है। हालांकि, प्रभावी नीतियों से 2030 तक रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री $3.5 बिलियन का आंकड़ा छू सकती है। वर्तमान क्षमता 60,000 टन है, लेकिन रिकवर्ड मैटेरियल्स (Recovered Materials) के लिए कमजोर सप्लाई चेन के कारण यह पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रही है। अनुमान है कि 2030 तक क्षमता बढ़कर 117,000 टन हो सकती है, जो 2026 में अनुमानित 44,000 टन से काफी ज्यादा है। यह क्षेत्र कच्चे माल की कीमतों में अस्थिरता को मैनेज करने और सेल मैन्युफैक्चरर्स के लिए लोकल मटेरियल सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण है।
भारत अपनी एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कच्चे तेल के इम्पोर्ट पर निर्भरता से आगे बढ़कर लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स के लिए 100% इम्पोर्ट-डिपेंडेंट (Import-Dependent) बनने के रास्ते पर है। इन मैटेरियल्स पर देश का इम्पोर्ट बिल लगातार बढ़ रहा है, और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) की धीमी गति इसे और बढ़ा रही है। चीन-लिंक्ड सप्लाई चेन पर निर्भरता भू-राजनीतिक तनावों, एक्सपोर्ट कंट्रोल (Export Controls) और संभावित प्राइस मैनिपुलेशन (Price Manipulation) के खतरे पैदा करती है।
PLI स्कीम के तहत डोमेस्टिक ACC क्षमता स्थापित करने में लगातार हो रही देरी, लाभार्थियों का एक्सटेंशन मांगना और पेनल्टी (Penalties) लगना, पॉलिसी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि लोकल कैपेबिलिटी (Capability) में समानांतर वृद्धि के बिना इम्पोर्ट पर यह बढ़ती निर्भरता, भारत के इम्पोर्ट बिल को ऊंचा रखेगी और EV एडॉप्शन के जरिए हासिल की जाने वाली रणनीतिक स्वतंत्रता को कमजोर करेगी। बैटरी कंपोनेंट्स के लिए एक स्थिर, लोकल सप्लाई चेन सुरक्षित करने में विफलता, भारत को ग्लोबल मार्केट शिफ्ट्स और सप्लायर कंसंट्रेशन रिस्क (Supplier Concentration Risks) के प्रति उजागर करती है, जिससे उसके क्लीन एनर्जी ऑब्जेक्टिव्स (Clean Energy Objectives) खतरे में पड़ सकते हैं।
भारत की EV बैटरी की मांग 2032 तक दस गुना बढ़ने की उम्मीद है, जिसके लिए लोकल मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) का बड़े पैमाने पर विस्तार जरूरी है। इस मांग को पूरा करने की सफलता वर्तमान नीति क्रियान्वयन (Policy Execution) की समस्याओं को दूर करने, क्रिटिकल मिनरल्स और बैटरी कंपोनेंट्स के डोमेस्टिक प्रोडक्शन को तेज करने और रीसाइक्लिंग इकोसिस्टम को मजबूत करने पर निर्भर करती है। इन चुनौतियों का समाधान न करने पर उच्च इम्पोर्ट निर्भरता बनी रह सकती है, जिससे भारत के EV सेक्टर और व्यापक क्लीन एनर्जी लक्ष्यों की प्रगति बाधित होगी। तेज लोकलाइजेशन (Localization) के प्रयास और अधिक प्रभावी नीतियां ही भारत को इम्पोर्ट-डिपेंडेंट मार्केट से ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब में बदल सकती हैं।