भारत का EMS सेक्टर अब केवल असेंबली तक सीमित नहीं है। सरकारी प्रोत्साहन और कस्टम ड्यूटी में कटौती के दम पर ये कंपनियां अब हाई-वैल्यू कंपोनेंट बनाने की ओर रुख कर रही हैं, जिससे मुनाफे के नए रास्ते खुल रहे हैं।
भारत का इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अब तक यहां की बड़ी कंपनियां स्मार्टफोन या घरेलू उपकरणों की असेंबली जैसे साधारण काम पर निर्भर थीं। इस मॉडल में प्रॉफिट मार्जिन काफी कम, लगभग 2% से 4% तक ही रहता है, क्योंकि असेंबली का काम तकनीकी रूप से उतना जटिल नहीं होता।
सरकार की नई चाल
बजट 2026 में सरकार के फैसलों ने इस पूरी तस्वीर को बदलने की नींव रख दी है। सरकार ने मोबाइल फोन, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) और चार्जर जैसे जरूरी इनपुट्स पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 20% से घटाकर 15% कर दिया है। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के लिए ₹40,000 करोड़ का बड़ा आवंटन किया गया है। इसका साफ मकसद कंपनियों को सिर्फ 'असेंबलर' से हटाकर 'मेकर' बनाना है।
प्रमुख खिलाड़ियों की तैयारी
Dixon Technologies, Amber Enterprises, Kaynes Technology और Syrma SGS जैसी बड़ी कंपनियां अब प्रीसिजन मैकेनिकल कंपोनेंट्स, सेमीकंडक्टर असेंबलीज और स्पेशलाइज्ड PCBs बनाने के लिए आक्रामक विस्तार कर रही हैं। इन पुर्जों को खुद बनाकर कंपनियां अपने मार्जिन को बेहतर करना चाहती हैं।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि यह रणनीति मुनाफे के लिहाज से बेहतरीन है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अभी भी भारतीय कंपनियां अपने जरूरी इनपुट्स के लिए 80% से 95% तक विदेशी स्रोतों पर निर्भर हैं। इतनी बड़ी निर्भरता रातों-रात खत्म नहीं हो सकती। साथ ही, एयरोस्पेस, डिफेंस या मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे एडवांस क्षेत्रों में उतरने के लिए भारी निवेश और स्किल्ड लेबर की जरूरत होगी। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि अगर इन कंपनियों का एग्जीक्यूशन सही नहीं रहा या खर्च उम्मीद से ज्यादा बढ़ा, तो मार्जिन पर दबाव दिख सकता है।
