ई-कचरे से खनिजों का 'गोल्ड रश' मुश्किल में? भारत की राह में बड़ी रुकावटें, चीन-EU से कड़ी टक्कर

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
ई-कचरे से खनिजों का 'गोल्ड रश' मुश्किल में? भारत की राह में बड़ी रुकावटें, चीन-EU से कड़ी टक्कर
Overview

इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) से महत्वपूर्ण खनिज निकालने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना कई बड़ी रुकावटों से जूझ रही है। 'अर्बन माइनिंग' के ज़रिए सप्लाई चेन को मज़बूत करने की कोशिशों के बावजूद, देश को चीन और यूरोपीय संघ (EU) जैसे दिग्गजों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बढ़ती मांग के कारण महत्वपूर्ण खनिजों (critical minerals) की ज़रूरत तेज़ी से बढ़ रही है। इसी को देखते हुए भारत ने अपने ई-कचरे को ही खनिजों का 'खज़ाना' बनाने की रणनीति पर काम शुरू किया है। इस 'अर्बन माइनिंग' (urban mining) पहल का मकसद लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ जैसे मूल्यवान तत्वों को पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकालना है।

भारत की 'अर्बन माइनिंग' रणनीति

चीन के खनिजों के उत्पादन और रिफाइनिंग पर एकाधिकार को कम करने और अपनी घरेलू सप्लाई चेन को मज़बूत करने के लिए भारत यह कदम उठा रहा है। सरकार ने लगभग $170 मिलियन का एक प्रोग्राम भी शुरू किया है और 'एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी' (EPR) जैसे नियमों को मज़बूत किया है। इसका लक्ष्य ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग को औपचारिक बनाना और उसे बड़े पैमाने पर करना है। अनुमान है कि भारत का ई-वेस्ट हर साल लगभग 1.5 मिलियन टन तक पहुंच जाता है, जिससे सालाना $6 बिलियन तक की कमाई की जा सकती है।

अनौपचारिक क्षेत्र की बड़ी चुनौती

हालांकि, इस योजना के रास्ते में बड़ी मुश्किलें हैं। भारत का 80% से ज़्यादा ई-वेस्ट अभी भी अनौपचारिक (informal) तौर पर छोटे वर्कशॉप्स में रीसायकल होता है। ये छोटे ऑपरेशन तांबा (copper) और एल्यूमीनियम (aluminium) जैसे धातु तो निकाल लेते हैं, लेकिन उनके पास कीमती और दुर्लभ खनिजों को कुशलता से निकालने की आधुनिक तकनीक और सुरक्षा प्रोटोकॉल नहीं हैं। कुछ साल पहले तक लगभग 99% रीसाइक्लिंग अनौपचारिक थी, लेकिन EPR नियमों के बाद यह घटकर लगभग 60% तक आ गई है। इसके बावजूद, अभी भी एक बड़ा हिस्सा बिना नियमों के इधर-उधर हो जाता है, जिससे कीमती सामग्री का नुकसान होता है और स्वास्थ्य व पर्यावरण को खतरा पहुँचता है।

वैश्विक दिग्गजों से पिछड़ता भारत

चीन और यूरोपीय संघ (EU) जैसे देश इस क्षेत्र में काफी आगे हैं। उन्होंने एडवांस्ड रिकवरी टेक्नोलॉजीज और मजबूत ट्रेसिबिलिटी सिस्टम में भारी निवेश किया है। भारत की औपचारिक रीसाइक्लिंग क्षमता अभी इनके मुकाबले काफी कमज़ोर है। इसके अलावा, भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए 100% आयात पर निर्भर है। औपचारिक रीसाइक्लिंग की आर्थिक व्यवहार्यता भी अस्थिर कमोडिटी कीमतों और एडवांस्ड प्रोसेसिंग की लागत से प्रभावित होती है।

आगे का रास्ता

इस फासले को पाटने के लिए सिर्फ नियम-कानून काफी नहीं हैं। 'एक्वोवर्क' (Ecowork) जैसी कंपनियां अनौपचारिक श्रमिकों को ट्रेनिंग देकर और उन्हें मूल्यवान खनिजों की पहचान सिखाकर इस क्षेत्र को मज़बूत बनाने की कोशिश कर रही हैं। इस विशाल अनौपचारिक क्षेत्र को बड़े पैमाने पर एकीकृत करने, सुरक्षा सुनिश्चित करने और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन कराने का काम बेहद चुनौतीपूर्ण है। सरकार के EPR और प्रत्यक्ष निवेश जैसे प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन रिकवरी टेक्नोलॉजी में निरंतर नवाचार, भारी पूंजी निवेश और औपचारिक व अनौपचारिक क्षेत्रों के बीच प्रभावी सहयोग भारत की महत्वपूर्ण खनिज सप्लाई चेन को वास्तव में मज़बूत करने के लिए ज़रूरी होगा।

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