'मेक इन इंडिया' को मिलेगी नई उड़ान: जानें स्कीम के फायदे
केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित यह 'ड्यूटी डेफरेमेंट स्कीम' घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेस एंड कस्टम्स (CBIC) की एक बड़ी पहल है। इसके तहत, पात्र निर्माता आयातक (EMI) आयात शुल्क का भुगतान एकमुश्त (upfront) करने के बजाय, हर महीने एक साथ कर सकेंगे। इस कदम का मुख्य उद्देश्य निर्माताओं, विशेषकर छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) की लिक्विडिटी (liquidity) को बेहतर बनाना, देरी को कम करना और वर्किंग कैपिटल (working capital) को बढ़ाना है। यह पूरी तरह से डिजिटल है और 1 अप्रैल, 2026 से अगले दो वर्षों के लिए लागू होगी, जिससे व्यापार को सुचारू बनाने में मदद मिलेगी।
परिचालन (Operational) सुधार और 'मेक इन इंडिया' से जुड़ाव
यह स्कीम निर्माता आयातकों के लिए अपने आयात शेड्यूलिंग (import scheduling) और इन्वेंटरी मैनेजमेंट (inventory management) को बेहतर बनाने में मदद करेगी। यह उन निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और जिन्हें लॉजिस्टिक्स लागत (logistics costs) और फाइनेंस तक पहुंच (access to finance) जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। MSMEs के लिए, यह स्कीम नकदी प्रवाह (cash flow) की समस्याओं को दूर करके उनके विकास को गति देगी। यह सरकार की 'मेक इन इंडिया' योजना के अनुरूप है, जिसका लक्ष्य देश की विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाना है, जिससे देश बेहतर वैश्विक स्थिति हासिल कर सके।
कौन उठा सकता है इस स्कीम का लाभ?
इस स्कीम का लाभ उठाने के लिए, निर्माता आयातकों के पास एक वैध इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट कोड (IEC) होना चाहिए। साथ ही, पिछले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में कम से कम 25 सामान्य आयात-निर्यात (EXIM) फाइलिंग या MSMEs के लिए 10 फाइलिंग का अच्छा रिकॉर्ड होना चाहिए। GST अनुपालन (compliance) भी अनिवार्य है, जिसमें कोई भी रिटर्न लंबित न हो। आवेदक को वित्तीय रूप से स्थिर और सीमा शुल्क अधिकारियों के साथ स्वच्छ रिकॉर्ड बनाए रखना होगा। आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह से डिजिटल है और 1 मार्च, 2026 से AEO पोर्टल के माध्यम से की जा रही है।
संभावित जोखिम और अनुपालन चुनौतियाँ
हालांकि यह स्कीम विश्वास-आधारित (trust-based) है, लेकिन स्वयं-अनुपालन (self-compliance) की कमी से धोखाधड़ी या ड्यूटी चोरी (duty evasion) के मामले बढ़ सकते हैं। मजबूत निगरानी (oversight) के अभाव में, यह स्कीम वित्तीय हेरफेर (financial manipulation) का शिकार हो सकती है। कुछ उन्नत देशों के विपरीत, भारत की इस स्कीम में वित्तीय स्थिरता और अनुपालन इतिहास की गहन जांच की आवश्यकता होगी। इस स्कीम की दो-वर्षीय अवधि यह सवाल भी उठाती है कि क्या यह एक स्थायी नीतिगत बदलाव है या अल्पकालिक राहत। CBIC के लिए समय पर शुल्क संग्रह और अनुपालन बनाए रखना एक चुनौती होगी।
आगे का रास्ता और क्षेत्र पर प्रभाव
जानकारों का मानना है कि यह स्कीम विनिर्माण क्षेत्र के लिए नकदी प्रवाह और दक्षता में सुधार करके उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा दे सकती है। यह भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (global supply chains) में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। स्कीम की दीर्घकालिक सफलता सरकारी समर्थन, मजबूत प्रवर्तन (enforcement) और बदलते व्यापार परिदृश्य के अनुकूलन पर निर्भर करेगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसके लाभ स्थायी विकास की ओर ले जाएं।