आयात पर निर्भरता कम करने की रणनीति
देश को महत्वपूर्ण खनिजों के लिए आयात पर अपनी गहरी निर्भरता से बाहर निकालने के लिए एक बड़ा बदलाव लाया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने इस बदलाव की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा है कि भारत को संसाधनों पर निर्भर राष्ट्र से बदलकर अपने देश में ही मूल्य-वर्धित (value-added) उत्पाद बनाने वाला देश बनना होगा। यह बदलाव इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि भारत लिथियम, कोबाल्ट जैसे ज़रूरी खनिजों के लिए लगभग 95% तक आयात पर निर्भर है, जो वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई चेन में रुकावटों के चलते एक बड़ी कमजोरी साबित हो सकती है।
नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन (NCMM) का खाका
इस रणनीति की नींव 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' (NCMM) है। यह एक सात-वर्षीय योजना है, जिसकी शुरुआती लागत ₹32,000 करोड़ है। सरकार का लक्ष्य ₹16,300 करोड़ के सरकारी खर्च के साथ ₹18,000 करोड़ का PSU निवेश आकर्षित करना है। यह मिशन खनिज खोज (exploration), निष्कर्षण (extraction), प्रोसेसिंग, रीसाइक्लिंग और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसी पूरी वैल्यू चेन को मज़बूत करेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश भर में पहले ही 4,000 से ज़्यादा क्रिटिकल मिनरल खोज गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं। NCMM का लक्ष्य 2030-31 तक 1,200 डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स पूरे करना है, ताकि लिथियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (rare earth elements) जैसे कम से कम 15 महत्वपूर्ण खनिजों का घरेलू उत्पादन सुनिश्चित हो सके। सरकार शुरुआती खोज के जोखिम को कम करने के लिए नेशनल मिनरल एक्सप्लोरेशन ट्रस्ट (NMET) के ज़रिए 41 प्राइवेट एक्सप्लोरेशन एजेंसियों को 100% फंडिंग भी दे रही है।
इकोसिस्टम डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग पर ज़ोर
नवाचार (innovation) और स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए नौ सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस (Centres of Excellence) चुने गए हैं, जिनमें प्रमुख IITs और CSIR लैब्स शामिल हैं। घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए, ₹7,280 करोड़ की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत सिंटर्ड रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट (sintered rare-earth permanent magnets) का उत्पादन इस साल शुरू होने वाला है। इस योजना का लक्ष्य पांच प्लांट्स में 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) की इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी स्थापित करना है। यह कदम मैग्नेट प्रोडक्शन में चीन के लगभग एकाधिकार को चुनौती देने के लिए अहम है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए चुने गए हैं, ताकि घरेलू वैल्यू एडिशन को बढ़ाया जा सके। इसके अलावा, ई-वेस्ट (e-waste) और बैटरी स्क्रैप (battery scrap) से क्रिटिकल मिनरल्स की रीसाइक्लिंग क्षमता बढ़ाने के लिए ₹1,500 करोड़ की एक इंसेंटिव स्कीम बनाई गई है, जिसका लक्ष्य सालाना 40 किलोटन (kilotonnes) क्रिटिकल मिनरल रिकवरी करना है।
वैश्विक परिदृश्य और साझेदारी
भारत अपनी रणनीति को समझते हुए यह जानता है कि वैश्विक सहयोग इसके लिए बेहद ज़रूरी है। देश विदेशी संपत्तियों (overseas asset acquisitions) को हासिल करने और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को मज़बूत करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है। कनाडा, जो क्रिटिकल मिनरल्स का एक प्रमुख उत्पादक है, भारत के लिए एक स्थिर साझेदार बनने की मंशा जता चुका है। दोनों देशों के बीच खोज, प्रोसेसिंग और मज़बूत सप्लाई चेन को लेकर बातचीत चल रही है। कनाडा अपने क्रिटिकल मिनरल्स सॉवरेन फंड (Critical Minerals Sovereign Fund) के ज़रिए भारत के निवेश से मेल खाने की पेशकश भी कर रहा है। भारत ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और चिली जैसे देशों के साथ भी अपने संबंध मज़बूत कर रहा है, जो लिथियम, कोबाल्ट और निकेल से समृद्ध हैं। ये साझेदारियां मुख्य रूप से खनिज़ विदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) जैसी संस्थाओं के ज़रिए हो रही हैं, ताकि लंबे समय तक सप्लाई सुनिश्चित की जा सके। इन साझेदारियों का मुख्य उद्देश्य चीन पर निर्भरता कम करना है, जो वर्तमान में रेयर अर्थ एलिमेंट्स ( 90% से ज़्यादा) और मैग्नेट प्रोडक्शन ( 90% से ज़्यादा) की वैश्विक प्रोसेसिंग पर हावी है।
चुनौतियां और बाज़ार की हकीकत
इतनी महत्वाकांक्षी योजना के बावजूद, कई गंभीर चुनौतियां सामने हैं। भारत की लिथियम, कोबाल्ट और निकेल के लिए 100% आयात पर निर्भरता एक बड़ी बाधा है। घरेलू स्तर पर निष्कर्षण और प्रोसेसिंग क्षमता की कमी, साथ ही दशकों पुराने रेगुलेटरी अड़चनों (जैसे Mines and Minerals (Development and Regulation) Act) से प्रगति धीमी पड़ सकती है। क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक मांग तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है, जिससे 2040 तक बाज़ार का आकार 770 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसे में, एसेट्स के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा और उत्पादक देशों से रिसोर्स नेशनलिज़्म (resource nationalism) का खतरा बढ़ सकता है। वैश्विक कीमतों में अस्थिरता भी निवेश निर्णयों और परियोजनाओं की व्यवहार्यता को जटिल बनाती है। NCMM के सफल कार्यान्वयन के लिए कई मंत्रालयों, PSUs और प्राइवेट प्लेयर्स के बीच सहज तालमेल की आवश्यकता होगी, जो कि एक जटिल कार्य है और इसमें स्वाभाविक जोखिम शामिल हैं। भले ही भारत के पास महत्वपूर्ण खनिज भंडार हों, लेकिन उनकी आर्थिक व्यवहार्यता और तेज़ी से निष्कर्षण अनिश्चित बना हुआ है। घरेलू खदानों से महत्वपूर्ण आउटपुट मिलने में एक दशक से ज़्यादा का समय लग सकता है। PLI स्कीम की सफलता उच्च अपफ्रंट टेक्नोलॉजी लागतों, विशेष रूप से ऑक्साइड-टू-मेटल कन्वर्ज़न जैसे मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग चरणों में, को पूरा करने के लिए पर्याप्त प्राइवेट निवेश को आकर्षित करने पर निर्भर करेगी।
भविष्य की राह
भारत का क्रिटिकल मिनरल्स बाज़ार 2030 तक 1.2 लाख करोड़ रुपये (15 बिलियन अमेरिकी डॉलर) से ज़्यादा होने का अनुमान है, जो 12% से ज़्यादा की सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ेगा। NCMM की सफलता, जिसमें एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स, पेटेंट फाइलिंग और विदेशी एसेट अधिग्रहण के लक्ष्य हासिल करना शामिल है, वैश्विक सप्लाई चेन की कमजोरियों से निपटने में महत्वपूर्ण होगी। रणनीतिक आवश्यकता स्पष्ट है: इन खनिजों को सुरक्षित करना भारत के क्लीन एनर्जी ट्रांज़िशन, तकनीकी उन्नति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मौलिक है, और यह देश के औद्योगिक भविष्य को बदलने की क्षमता रखता है।