चीन का कंटेनर प्रभुत्व खतरे में, भारत घरेलू उत्पादन पर लगा रहा दांव
दशकों से, वैश्विक शिपिंग कंटेनर बाजार लगभग पूरी तरह से चीन के नाम रहा है। अनुमान है कि दुनिया के 96% कंटेनर चीन में ही बनते हैं, जिनकी संख्या 2024 में ही लगभग 81 लाख TEU तक पहुँच सकती है। चीन की यह विशालता, एकीकृत सप्लाई चेन और किफ़ायती दाम ने वैश्विक व्यापार को हमेशा से सहारा दिया है। मगर, हाल ही में COVID-19 महामारी और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर किया है, जिसके चलते अब भारत जैसे देश आत्मनिर्भरता की ओर देख रहे हैं।
घरेलू क्षमता बढ़ाने के पीछे की वजह
वैश्विक सप्लाई चेन में आई गंभीर रुकावटों के दौरान यह साफ हो गया था कि सिर्फ एक जगह पर निर्भर रहना कितना खतरनाक है। कंटेनर की कमी, माल ढुलाई की दरों में भारी उछाल (जो कुछ रास्तों पर $2,000 से बढ़कर $20,000 तक पहुंच गई थी) और निर्यात में हुई देरी ने लॉजिस्टिक्स की नाजुकता को उजागर किया। भारत, जो लगभग सभी कंटेनर आयात करता है, इस निर्भरता को एक बड़ी रणनीतिक कमजोरी के तौर पर देख रहा था। इसी को देखते हुए, भारतीय सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। 'मेक इन इंडिया' और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स के तहत, सरकार पांच साल में ₹10,000 करोड़ ($1.2 अरब) का निवेश कर रही है ताकि घरेलू कंटेनर निर्माण उद्योग को मज़बूती मिल सके, रोज़गार पैदा हो और देश की लॉजिस्टिक्स क्षमताएं बढ़ें।
पैमाने और लागत के बड़े अंतर को पाटना
घरेलू कंटेनर उद्योग को चीन के बराबर लाने की भारत की महत्वाकांक्षा के सामने कई बड़ी रुकावटें हैं। भारत में अभी सालाना 30,000 से 80,000 TEU कंटेनर बनते हैं, जबकि चीन लाखों TEU की क्षमता पर काम कर रहा है। लागत का अंतर भी बहुत बड़ा है; चीन में एक कंटेनर की कीमत लगभग $1,700 है, वहीं भारत में यह $2,500-$2,600 तक पड़ता है। इस अंतर की एक वजह यह भी है कि भारत, कंटेनर बनाने के मुख्य कच्चे माल, यानी ए-ग्रेड कॉर्टन स्टील के लिए भी अक्सर चीन से आयात पर निर्भर है। इसके अलावा, भारत में कंटेनर सर्टिफिकेशन की लागत $55-60 प्रति कंटेनर और बढ़ जाती है।
बाजार की चाल और स्टील की अहम भूमिका
कंटेनर बनाने की लागत में स्टील की कीमत सबसे बड़ा फैक्टर है। कंटेनर की संरचना का 90-95% हिस्सा स्टील से बनता है। वैश्विक स्टील कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव, जो ऊर्जा लागत, व्यापार नीतियों और भू-राजनीतिक घटनाओं से तय होते हैं, सीधे तौर पर कंटेनर उत्पादन की लागत को प्रभावित करते हैं। लाल सागर संकट और अन्य भू-राजनीतिक तनावों ने न केवल मांग को बढ़ाया है, बल्कि कीमतों में अस्थिरता और सप्लाई चेन की अनिश्चितता को भी बढ़ाया है। ऐसे में, नए खिलाड़ियों के लिए उन स्थापित चीनी निर्माताओं की लागत-दक्षता का मुकाबला करना एक चुनौती है, जिन्हें वर्टिकली इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन और कच्चे माल तक आसान पहुंच का फायदा मिलता है।
जानकारों की राय: सामने हैं ये बड़ी बाधाएं
भले ही सरकार का समर्थन और रणनीतिक मंशा मौजूद है, लेकिन भारत के घरेलू कंटेनर उद्योग का रास्ता कांटों भरा है। चीन का सबसे बड़ा फायदा दशकों का अनुभव, विशाल उत्पादन क्षमता और मज़बूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क है। चीन की इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता के सामने, भारत को लागत और उत्पादन के मामले में बराबरी करने के लिए लगातार पूंजी निवेश, तकनीकी उन्नति और या तो घरेलू कॉर्टन स्टील उत्पादन की व्यवस्था या फिर बहुत किफ़ायती आयात चैनलों की ज़रूरत होगी। विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक कंटेनर मांग 2025 में लगभग 2.6% बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन जहाजों की डिलीवरी के चलते शिपिंग उद्योग को आने वाले दशक में ओवरसप्लाई का सामना करना पड़ सकता है। यह एक जटिल बाजार माहौल है, जहाँ नए खिलाड़ियों को वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताओं और संभावित मूल्य युद्धों से जूझते हुए स्थापित दिग्गजों से मुकाबला करना होगा।
भविष्य की ओर: भारत के लिए यह लंबी लड़ाई है
भारत का कंटेनर निर्माण क्षमता विकसित करने का यह रणनीतिक फैसला, सप्लाई चेन के जोखिमों को पहचानने का एक बड़ा संकेत है। पांच साल की इस योजना का लक्ष्य 10 लाख TEU की वार्षिक घरेलू क्षमता हासिल करना है, जो मौजूदा उत्पादन से एक बड़ी छलांग होगी। 'पीएम गति शक्ति' जैसे कार्यक्रमों के तहत लॉजिस्टिक्स विकास के समर्थन से, यह पहल भारत की वैश्विक व्यापार में स्थिति को मज़बूत करने का लक्ष्य रखती है। हालांकि, इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत लागत के नुकसान और पैमाने की बाधाओं को कितनी अच्छी तरह पार कर पाता है, जिनका फायदा चीन हमेशा से उठाता आया है। यह अधिक मजबूती की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन चीन के विनिर्माण प्रभुत्व को चुनौती देना शायद एक बहु-वर्षीय, धीमी प्रक्रिया होगी।