ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत का कोयला गैसीकरण पर जोर
केंद्रीय कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया है कि कोयला गैसीकरण को राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता के लिए एक अहम तकनीक के तौर पर देखा जा रहा है। यह प्रक्रिया आयातित पेट्रोलियम उत्पादों और अमोनिया की जगह ले सकती है, जो कृषि और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए बेहद ज़रूरी हैं। भारत फिलहाल अपने कच्चे तेल का करीब 83% और मेथनॉल का 90% से ज़्यादा आयात करता है। अकेले अमोनिया के आयात पर 2024 में लगभग $982 मिलियन खर्च हुए हैं।
कोयला भंडार से कीमती उत्पाद
भारत के पास कोयले का विशाल भंडार है, जो 344 से 400 अरब टन तक है। नेशनल कोल गैसीफिकेशन मिशन का लक्ष्य 2030 तक सालाना 100 मिलियन टन कोयले को गैसीफाई करना है। इस रणनीति के तहत, कोयले को सिं-गैस (Syngas) में बदला जाएगा, जो हाइड्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड का मिश्रण है। इसका इस्तेमाल कई ज़रूरी उत्पाद बनाने में होता है। उदाहरण के लिए, ओडिशा में भारत कोल गैसीफिकेशन एंड केमिकल्स लिमिटेड (BCGCL) ₹25,000 करोड़ की एक परियोजना पर काम कर रही है, जिसमें BHEL की तकनीक का उपयोग करके कोयले से अमोनियम नाइट्रेट बनाया जाएगा। यह प्रोजेक्ट हर दिन 2,000 टन अमोनियम नाइट्रेट का उत्पादन करेगा, जिससे आयात पर निर्भरता कम होगी और घरेलू फर्टिलाइजर उत्पादन बढ़ेगा। कोयला गैसीकरण से सालाना ₹60,000 करोड़ से ₹90,000 करोड़ तक की आयात बचत हो सकती है।
सरकारी प्रोत्साहन और नीतिगत समर्थन
इस प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए, सरकार ने कोयला और लिग्नाइट गैसीफिकेशन परियोजनाओं के लिए ₹8,500 करोड़ का वित्तीय प्रोत्साहन (Financial Incentives) आवंटित किया है और इसे बढ़ाने की योजना है। नीतिगत सुधारों के तहत, गैसीकरण में उपयोग होने वाले कोयले के लिए कमर्शियल कोल ब्लॉक नीलामी में 50% रेवेन्यू शेयर छूट जैसे कदम उठाए गए हैं, ताकि प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर से निवेश को बढ़ावा मिले। कोल मिनिस्ट्री ने भूमि पट्टों (Land Leases) को सुरक्षित करने और नई गैसीकरण प्लांट्स के लिए कोयला सप्लाई की अलग से नीलामी की व्यवस्था करने में भी मदद की है। ₹64,000 करोड़ से अधिक की लागत वाली सात बड़ी कोयला गैसीकरण परियोजनाएं प्रगति पर हैं, जिनमें से कुछ का निर्माण कार्य शुरू हो चुका है।
चुनौतियाँ और पर्यावरण संबंधी चिंताएँ
हालांकि, कोयला गैसीकरण में चुनौतियां और आलोचनाएं भी हैं। इसे सीधे कोयला जलाने की तुलना में 'अधिक स्वच्छ' कहा जाता है, लेकिन यह अभी भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर करता है। ऐसे में, वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ इसकी अनुकूलता पर सवाल उठते हैं। इन बड़ी परियोजनाओं के लिए काफी निवेश की ज़रूरत होती है, और भारतीय कोयले में राख की ज़्यादा मात्रा तकनीकी दिक्कतें पैदा करती है। यह मेथनॉल और प्राकृतिक गैस जैसे सस्ते विकल्पों से भी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। जल की खपत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (Greenhouse Gas Emissions) जैसी पर्यावरणीय चिंताओं पर भी सावधानीपूर्वक प्रबंधन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए कार्बन कैप्चर (Carbon Capture) जैसी तकनीकों की ज़रूरत पड़ सकती है। परिचालन संबंधी चुनौतियों और कोयले की कार्बन सघनता को देखते हुए, नेट-जीरो उत्सर्जन की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान के मुकाबले इसे एक 'संक्रमणकालीन ईंधन' (Transitional Fuel) के रूप में देखना होगा।
मुख्य लक्ष्य और आत्मनिर्भरता
2030 तक 100 मिलियन टन कोयले को गैसीफाई करने का भारत का लक्ष्य, ऊर्जा और केमिकल उद्योगों को बदलने की उसकी मज़बूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है। घरेलू कोयले को ज़रूरी उत्पादों में बदलकर, भारत ऊर्जा स्वतंत्रता हासिल करने, विदेशी मुद्रा बचाने और औद्योगिक विकास को गति देने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा परियोजनाओं की सफलता और स्थानीय तकनीकों का विकास इस रणनीति की आर्थिक व्यवहार्यता और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होगा। कोयला गैसीकरण पर यह ज़ोर 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) पहल के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य आपूर्ति को सुरक्षित करना और अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाना है।