भारत में बिटुमेन (Bitumen) की कीमतें **₹85,000 से ₹86,000** प्रति टन के ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। पहले के **₹52,000-₹55,000** के स्तर के मुकाबले यह भारी बढ़ोतरी सड़क निर्माण कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल रही है।
भारत का सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। अगस्त 2026 के अंत तक, सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला मुख्य रॉ मटेरियल 'बिटुमेन' (VG-40 ग्रेड) ₹85,000 से ₹86,000 प्रति टन के भाव पर कारोबार कर रहा है। यह कीमत संकट से पहले के सामान्य स्तर ₹52,000-₹55,000 से काफी ज्यादा है।
महंगी रिफाइनिंग और सप्लाई का नया गणित
हालांकि सप्लाई चेन अब स्थिर हो गई है, लेकिन इसकी बड़ी कीमत कंपनियों को चुकानी पड़ रही है। सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए अब वेनेजुएला के क्रूड पर निर्भरता बढ़ी है। यह क्रूड 'सॉर' (Sour) कैटेगरी का होता है, जिसमें सल्फर की मात्रा ज्यादा होती है। इसे सड़क निर्माण के मानकों के अनुरूप बनाने के लिए रिफाइनिंग का खर्च काफी बढ़ जाता है, जिसका सीधा असर बाजार में बिटुमेन की कीमतों पर दिख रहा है।
मार्जिन पर दबाव और सरकारी राहत की उम्मीद
ज्यादातर हाईवे प्रोजेक्ट्स फिक्स्ड-प्राइस कॉन्ट्रैक्ट्स पर आधारित हैं, जो तब साइन किए गए थे जब कच्चे माल की लागत काफी कम थी। लागत में लगभग 60% की बढ़ोतरी ने कंपनियों के फाइनेंशियल मॉडल को बिगाड़ दिया है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या Ministry of Road Transport and Highways सितंबर 2026 के बाद भी राहत के उपायों को आगे बढ़ाएगी। अगर सरकारी मदद नहीं मिली, तो कंपनियों का कैश फ्लो और प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
पीक सीजन की चुनौती
मानसून के बाद अक्टूबर से फरवरी का समय कंस्ट्रक्शन के लिए सबसे अहम होता है। भले ही फिलहाल बिटुमेन की शॉर्टेज का डर खत्म हो गया है, लेकिन जब मानसून के बाद काम की डिमांड बढ़ेगी, तब कंपनियों के सामने लागत को नियंत्रित रखने की बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल सेक्टर सरकार के इंफ्रा पुश और बढ़ती इनपुट कॉस्ट के बीच फंसा हुआ है, जिसे ट्रैक करना निवेशकों के लिए बेहद जरूरी है।
