Adecco India की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत का बैटरी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर **2030** तक **20 लाख** नए रोजगार पैदा करने की राह पर है। यह बदलाव असेंबली से आगे बढ़कर फुल-स्केल सेल-टू-रीसायकलिंग की ओर जा रहा है।
भारत का बैटरी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अब कंपनियां सिर्फ असेंबली पर निर्भर रहने के बजाय वर्टिकली इंटीग्रेटेड मॉडल की ओर रुख कर रही हैं। Adecco India के आंकड़ों के मुताबिक, 2030 तक इस सेक्टर में 15 से 20 लाख नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है। यह केवल संख्या में बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि बैटरी इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता की मांग भी बढ़ा रहा है।
इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ा कदम
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा संकेत यह है कि भारत अब ग्लोबल मानकों वाली गीगा-फैक्ट्रीज (Gigafactories) पर फोकस कर रहा है। सरकार की ₹18,100 करोड़ की PLI (प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम के तहत 2026 तक 100 GWh की क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे कंपनियां विदेश से बैटरी सेल मंगाने के बजाय उन्हें यहीं बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। इस बड़े बदलाव के लिए गुजरात, कर्नाटक, हरियाणा और तेलंगाना जैसे राज्यों में कुशल इंजीनियरों की मांग बढ़ी है, जिन्हें 35% से 40% तक ज्यादा सैलरी पैकेज मिल रहे हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
हालांकि ग्रोथ की संभावनाएं बड़ी हैं, लेकिन निवेशकों को कुछ जोखिमों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पहला बड़ा खतरा कच्चे माल यानी लिथियम, निकल और कोबाल्ट की सप्लाई चेन है। भारत अभी भी इन खनिजों के लिए आयात पर निर्भर है, और इसकी कीमत में उतार-चढ़ाव सीधे कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर चोट कर सकता है।
दूसरा, सोलर सेक्टर की तरह यहां भी तेजी से क्षमता विस्तार के कारण भविष्य में ओवरसप्लाई और प्राइस वार का खतरा हो सकता है। यदि कंपनियां अपनी तकनीकी बढ़त बनाए नहीं रख पाती हैं या स्किल गैप बना रहता है, तो प्रोजेक्ट की लागत उम्मीद से कहीं अधिक बढ़ सकती है। निवेशकों को आने वाले समय में कंपनी के ऑपरेशनल अपडेट्स और कैपेसिटी यूटिलाइजेशन पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
