BHAVYA Scheme: 100 नए इंडस्ट्रियल पार्क का ऐलान! पर पुरानी मुश्किलें खड़ीं?

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AuthorMehul Desai|Published at:
BHAVYA Scheme: 100 नए इंडस्ट्रियल पार्क का ऐलान! पर पुरानी मुश्किलें खड़ीं?
Overview

सरकार ने देश में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए BHAVYA नाम की एक बड़ी स्कीम लॉन्च की है। इस स्कीम के तहत **₹33,660 करोड़** की लागत से **100** नए 'प्लग-एंड-प्ले' इंडस्ट्रियल पार्क बनाए जाएंगे। हालांकि, चीन के मॉडल से प्रेरणा लेने के बावजूद, इस स्कीम के सामने फंड की कमी, जमीन अधिग्रहण और सरकारी अड़चनों जैसी पुरानी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

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BHAVYA स्कीम का खाका

यूनियन कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद, BHAVYA स्कीम का लक्ष्य अगले पांच सालों (2026-27 से 2031-32) में 100 इंडस्ट्रियल पार्क विकसित करना है। इन पार्कों का आकार 100 से 1,000 एकड़ तक होगा। इनमें सड़क, अंडरग्राउंड यूटिलिटीज, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, पावर, पानी और वर्कर हाउसिंग जैसी सुविधाएं होंगी। केंद्र सरकार कोर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए प्रति एकड़ ₹1 करोड़ तक और एक्सटर्नल कनेक्टिविटी लागत का 25% तक आर्थिक मदद देगी। प्रोजेक्ट्स को 'चैलेंज' मोड के जरिए चुना जाएगा, जिसमें पहले से क्लियर जमीन, ट्रांसपोर्ट हब के पास लोकेशन, स्किल्ड लेबर की उपलब्धता और 60 दिन में सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम का वादा करने वालों को प्राथमिकता मिलेगी।

चीन की राह और भारत की हकीकत

BHAVYA स्कीम चीन के सफल इंडस्ट्रियल पार्क मॉडल से प्रेरणा लेती है, जो मजबूत सरकारी बैकिंग, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और सुनियोजित विकास पर आधारित है। लेकिन, भारत में ज्यादातर प्रोजेक्ट पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर होंगे, जिसके नतीजे मिले-जुले रहे हैं। PPP मॉडल में प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है, हालांकि कंस्ट्रक्शन टाइमलाइन छोटी और मेंटेनेंस बेहतर हो सकता है। इनमें लागत बढ़ने और रेगुलेटरी अनिश्चितता जैसी समस्याएं भी हैं।

वही पुरानी अड़चनें

यह स्कीम उन बुनियादी समस्याओं का कोई खास समाधान नहीं करती, जिन्होंने भारत के इंडस्ट्रियल जोन को लंबे समय से रोका है। फंड की कमी एक बड़ी वजह है, जिसके चलते PPP मॉडल के नतीजे चीन के स्टेट-बैकड मॉडल से अलग रहे हैं। जमीन का अधिग्रहण अभी भी एक बड़ी बाधा है, जो देरी और विवादों का कारण बनती है। 2013 के राइट टू फेयर कंपनसेशन एक्ट की जटिलताओं से प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

इसके अलावा, सरकारी क्लीयरेंस से परे परमिट लेने में होने वाली ब्यूरोक्रेटिक देरी और स्थानीय भ्रष्टाचार पर भी यह स्कीम ध्यान नहीं देती। लेबर लॉ में फ्लेक्सिबिलिटी की जरूरत को भी नजरअंदाज किया गया है। हालांकि सरकार ने लेबर कानूनों को सरल बनाया है, लेकिन अभी भी जॉब इनसिक्योरिटी का डर बना हुआ है। पास्ट की स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) की परफॉर्मेंस बताती है कि प्रोसेसिंग एरिया में 45% तक वैकेंसी खाली रह गई है, क्योंकि कई SEZ इंफ्रास्ट्रक्चर और जमीन की समस्याओं के कारण पूरी तरह चालू नहीं हो पाए। पब्लिक SEZ के मुकाबले प्राइवेट SEZ बेहतर साबित हुए हैं।

भविष्य की राह

आखिरकार, BHAVYA स्कीम की सफलता इसके मॉडर्न डिजाइन से ज्यादा, इन फंडामेंटल स्ट्रक्चरल बाधाओं को दूर करने पर निर्भर करेगी। अगर सस्टेन्ड फंडिंग, आसान जमीन अधिग्रहण, सरल लोकल ब्यूरोक्रेसी और लेबर लॉ में रियल फ्लेक्सिबिलिटी के मजबूत सिस्टम नहीं बने, तो यह स्कीम अपने पोटेंशियल से कमतर रह सकती है। इससे पहले के इंडस्ट्रियल जोन और SEZ की तरह ही कम परफॉर्मेंस देखने को मिलेगी, जो भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ की महत्वाकांक्षाओं को धीमा कर देगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.