महंगाई का दबाव और धीमी ग्रोथ
इस धीमी रफ्तार की एक बड़ी वजह ग्लोबल मार्केट में बढ़ती महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव है। खासकर, मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहे संघर्षों का असर कमोडिटी (Commodity) कीमतों पर साफ दिख रहा है। इसके चलते, भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को अगस्त 2022 के बाद से इनपुट कॉस्ट (Input Costs) में सबसे तेज बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा है। एल्युमिनियम, केमिकल्स और फ्यूल जैसे कच्चे माल की कीमतें आसमान छू रही हैं। नतीजतन, आउटपुट प्राइस (Output Prices) यानी तैयार माल की कीमतें भी पिछले छह महीनों में सबसे तेजी से बढ़ी हैं।
डिमांड में नरमी, पर एक्सपोर्ट में तेजी
हालांकि, उत्पादन (Production) और नए ऑर्डर्स (New Orders) में बढ़ोतरी की रफ्तार भी जून 2022 के बाद से दूसरी सबसे धीमी रही। इसकी वजह कॉम्पिटिशन, भू-राजनीतिक तनाव और ग्राहकों द्वारा अप्रूवल में देरी बताई जा रही है। इसके बावजूद, एक्सपोर्ट ऑर्डर्स (Export Orders) में पिछले सात महीनों की सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो सेक्टर के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
रोजगार बढ़ा, पर इन्वेंट्री पर पैनी नजर
इन चुनौतियों के बावजूद, भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने रोजगार (Employment) के अवसर 10 महीने के उच्चतम स्तर पर बढ़ाए हैं, क्योंकि कंपनियां भविष्य की डिमांड को लेकर आशावादी हैं। वहीं, कंपनियां सतर्कता बरत रही हैं और इन्वेंट्री (Inventories) को कम रखा है। इन्वेंट्री ग्रोथ पिछले लगभग पांच सालों में सबसे धीमी रही है। यह सुस्त बिक्री की उम्मीदों और बढ़ती कीमतों के बीच वर्किंग कैपिटल को मैनेज करने की जरूरत को दर्शाता है।
वैश्विक तस्वीर और इकोनॉमिस्ट की राय
अगर दुनिया भर के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की बात करें तो अप्रैल में चीन का PMI 50.3 पर स्थिर रहा, जो मार्च से थोड़ा कम है। वहीं, जापान के मैन्युफैक्चरिंग PMI में अच्छी उछाल देखी गई और यह 55.1 पर पहुंच गया, जो जनवरी 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। मार्च में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग PMI 51.3 रहा।
HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट, प्रांजुल भंडारी ने कहा कि सेक्टर चुनौतियों के बावजूद लचीला बना हुआ है। हालांकि, मध्य पूर्व के संघर्षों से प्रेरित महंगाई एक बड़ी चिंता का विषय है, जो इकोनॉमिक आउटलुक को प्रभावित कर सकती है। उम्मीद है कि कंपनियां लागत नियंत्रण और इन्वेंट्री मैनेजमेंट पर ध्यान केंद्रित करती रहेंगी।
