इकोसिस्टम बनाम असेंबली का फासला
Patrick McGee, जो Apple की ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग पर गहरी नजर रखते हैं, उनका मानना है कि भारत की Apple की सप्लाय चेन में चीन का एक बड़ा विकल्प बनने की महत्वाकांक्षा एक 'लंबा, बहु-दशकीय खेल' है। भारत से iPhone एक्सपोर्ट के बढ़ते आंकड़े भले ही अच्छे लगें, लेकिन ये एक बड़ी सच्चाई को छुपाते हैं: इन एक्सपोर्ट की वैल्यू का एक बड़ा हिस्सा आयातित कंपोनेंट्स से आता है, खासकर चीन, ताइवान और कोरिया से। यह आयात पर निर्भरता घरेलू वैल्यू एडिशन को रोकती है, जो सप्लाय चेन की असली मजबूती के लिए बेहद जरूरी है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत अपने इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का करीब 80% आयात करता है, जो स्वदेशी हार्डवेयर डिजाइन और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में एक बड़ी कमी को दर्शाता है। इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में वैल्यू एडिशन सिर्फ 15-20% के आसपास है, जो 2030 तक 35-40% के टारगेट से काफी कम है। इससे साफ है कि हम अभी भी सिर्फ 'असेंबली' पर ज्यादा निर्भर हैं, न कि गहरी, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग पर।
कंपीटिशन का मैदान: चीन, वियतनाम और ग्लोबल हलचल
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन यह एक बेहद प्रतिस्पर्धी ग्लोबल माहौल में काम कर रहा है। चीन की मैन्युफैक्चरिंग ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे सालाना करीब 2,95,000 इंडस्ट्रियल रोबोट लगाते हैं, जो दुनिया की आधी से ज्यादा मांग है, और उनके पास कुल 20.3 लाख से ज्यादा रोबोट काम कर रहे हैं। ऑटोमेशन और एक विशाल, एकीकृत सप्लायर नेटवर्क का यह जाल एक ऐसा इकोसिस्टम बनाता है जिसे दोहराना बहुत मुश्किल है। वहीं, वियतनाम ने खुद को एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के तौर पर खड़ा किया है। इलेक्ट्रॉनिक गुड्स पर 1% से कम का औसत टैरिफ (भारत के करीब 9% के मुकाबले) इसे विदेशी निवेश के लिए आकर्षक बनाता है। वियतनाम के कुल एक्सपोर्ट में इलेक्ट्रॉनिक्स का हिस्सा करीब 40% है, जो प्रति व्यक्ति $1,400 के एक्सपोर्ट वैल्यू के बराबर है। भारत का मैन्युफैक्चरिंग PMI मजबूत बना हुआ है, लेकिन अपने दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में भारत को ऊंचे घरेलू टैरिफ और जटिलताओं से जूझना पड़ता है।
ताइवानी फैक्टर और सरकारी नीतियाँ
भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम के विकास में ताइवान की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों का रोल बहुत अहम है, ठीक वैसे ही जैसे चीन के लिए उनका रोल था। Foxconn, Wistron और Pegatron जैसी कंपनियां भारत में iPhone और अन्य कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रोडक्शन प्लांट लगाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर चुकी हैं। ये निवेश सिर्फ असेंबली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ताइवानी कंपनियां महत्वपूर्ण तकनीकी विशेषज्ञता ला रही हैं और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग में भी जोर दे रही हैं। भारत सरकार ने 'मेक इन इंडिया' पहल और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी स्कीमें लागू की हैं ताकि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिले और विदेशी निवेश आकर्षित हो। हालांकि, ये स्कीमें असेंबली से आगे बढ़कर गहरी लोकलाइजेशन और वैल्यू एडिशन को कितना बढ़ावा दे रही हैं, यह अभी बहस का विषय है।
रास्ते की बाधाएं: इंफ्रा, बिखराव और चीन का साया
भारत में एक मजबूत, आत्मनिर्भर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम बनाने का रास्ता चुनौतियों से भरा है। भारत में लॉजिस्टिक्स की लागत GDP का करीब 13-14% है, जो ग्लोबल एवरेज 8-9% से काफी ज्यादा है, जिससे प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है। यह रोड फ्रेट पर ज्यादा निर्भरता, ट्रांसपोर्ट के साधनों में कम इंटीग्रेशन, पोर्ट पर ज्यादा समय लगना और सप्लाई चेन का बिखराव इसे और जटिल बनाता है। ऑटोमेशन और डिजिटल एनालिटिक्स जैसे खास क्षेत्रों में टैलेंट की कमी भी आधुनिक समाधानों को अपनाने में बाधा डालती है। चीन के विशाल औद्योगिक क्लस्टर और ऑटोमेशन की क्षमता एक ऐसी बड़ी ताकत है जिसे दशकों लग जाएंगे भारत में दोहराने में। वियतनाम भले ही कम लागत और सरल टैरिफ दे, लेकिन वह भी आयातित कंपोनेंट्स और विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर है। भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, ग्रोथ के बावजूद, कम वैल्यू एडिशन और आयातित कंपोनेंट्स पर निर्भरता के लिए आलोचना का शिकार होता रहा है, जिसका मतलब है कि दुनिया के बड़े ब्रांड्स के लिए 'असेंबली हब' बने रहने से आगे बढ़ने में अभी लंबा सफर तय करना है।