भारत का **27%** इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य चीनी मिलों के लिए नई चुनौतियां लेकर आया है। सरकार द्वारा कीमतों पर नियंत्रण के कारण अब कंपनियों के लिए ऑपरेशनल एफिशिएंसी और लॉजिस्टिक्स में सुधार करना ही मुनाफे को बचाने का एकमात्र तरीका है।
भारत सरकार अब इथेनॉल ब्लेंडिंग को 20% से बढ़ाकर 27% करने की ओर तेजी से बढ़ रही है। इस लक्ष्य को हासिल करना सेक्टर के लॉन्ग टर्म ग्रोथ के लिए तो अच्छा है, लेकिन इसने इंडस्ट्री के सामने बड़े ऑपरेशनल बॉटलनेक्स खड़े कर दिए हैं। अब चुनौती सिर्फ डिस्टिलरी क्षमता बढ़ाने की नहीं, बल्कि किसानों, मिलों और प्रोसेसिंग यूनिट्स के बीच सप्लाई चेन को मैनेज करने की है।
मुनाफे पर क्यों है दबाव?
चीनी सेक्टर का बिजनेस मॉडल थोड़ा पेचीदा है क्योंकि यहां मिलों के पास अपनी मनमर्जी से दाम तय करने की आजादी कम है। सरकार गन्ने की कीमत यानी FRP (Fair and Remunerative Price) और SAP (State Advised Price) तय करती है, साथ ही चीनी की बिक्री पर भी नियंत्रण रहता है। ऐसे में, यदि कोई मिल गन्ने और मोलासेस के फ्लो को सही तरह से मैनेज नहीं कर पाती, तो वह इथेनॉल से मिलने वाले हाई-मार्जिन का फायदा नहीं उठा पाएगी।
डिजिटल अपग्रेड की जरूरत
फिलहाल, ज्यादातर कंपनियां मैन्युअल और अलग-थलग प्रोसेस पर निर्भर हैं, जिससे कई बार मिल में गन्ना पहले पहुंच जाता है और डिस्टिलरी तैयार नहीं होती। इस गैप को भरने के लिए अब कंपनियां डेटा-ड्रिवन प्लेटफॉर्म्स की मदद ले रही हैं। Balrampur Chini, Shree Renuka Sugars, Triveni Engineering, EID Parry और Dalmia Bharat Sugar जैसी कंपनियों के लिए यह डिजिटल इंटीग्रेशन भविष्य में विनर्स और लूजर्स के बीच का फर्क तय करेगा।
निवेशकों को अब सिर्फ कैपेसिटी एक्सपेंशन पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि कौन सी कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को कितना बेहतर तरीके से सिंक (sync) कर रही हैं। डिस्टिलरी की कैपेसिटी यूटिलाइजेशन और मैनेजमेंट की डिजिटल अडॉप्शन पर की गई कमेंट्री ही आने वाले समय में शेयर की चाल तय करेगी।
