सितंबर से भारतीय स्टील कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स की कीमतों में ₹2,000 प्रति टन तक की बढ़ोतरी करने की तैयारी में हैं। मानसून के बाद बढ़ती डिमांड और सप्लाई में कमी के चलते यह फैसला लिया गया है, हालांकि ग्लोबल मार्केट से आने वाली चुनौतियों पर भी नजर रखना जरूरी है।
मानसून का असर कम होते ही भारतीय स्टील मैन्युफैक्चरर्स ने कीमतों को बढ़ाने का संकेत दे दिया है। इस बढ़ोतरी के बाद बेंचमार्क स्टील की कीमतें ₹72,500 प्रति टन के स्तर तक पहुंच सकती हैं। इस फैसले के पीछे की मुख्य वजह मानसून के दौरान मिलों में हुए मेंटेनेंस शटडाउन और उसके बाद अचानक आई डिमांड का बढ़ना है।
डिमांड और सप्लाई का समीकरण
सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और ऑटोमोटिव सेक्टर में जबरदस्त रिकवरी देखी जा रही है। 2026 में ऑटो सेक्टर की सेल्स में 21% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कंपनियों ने मानसून की सुस्त मांग को देखते हुए पहले उत्पादन घटा दिया था, लेकिन अब अचानक आए ऑर्डर्स से सप्लाई टाइट हो गई है, जिसका फायदा उठाकर कंपनियां दाम बढ़ा रही हैं।
मार्जिन पर दबाव और लागत
कीमतें बढ़ाने का एक बड़ा कारण कोकिंग कोल (Coking Coal) की लगातार बढ़ती कीमत भी है। साल की शुरुआत से ही रॉ मटेरियल की लागत बढ़ने से स्टील कंपनियों का मार्जिन दबाव में रहा है। अब कंपनियां इस बोझ को ग्राहकों पर डालने की फिराक में हैं ताकि मुनाफे को प्रोटेक्ट किया जा सके।
इंपोर्ट का रिस्क
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है इंपोर्ट मार्केट पर नजर रखना। फिलहाल भारत कुछ स्टील इंपोर्ट्स पर 12% की सेफगार्ड ड्यूटी लगाता है, जिससे घरेलू कंपनियों को राहत मिलती है। हालांकि, जैसे ही घरेलू स्टील के दाम बढ़ते हैं, चीन, रूस और जापान से आने वाले सस्ते स्टील के मुकाबले में अंतर कम हो जाता है। अगर यह गैप और कम हुआ, तो घरेलू खरीदार विदेशी स्टील की ओर रुख कर सकते हैं।
आने वाले महीनों में वॉल्यूम ग्रोथ तो मजबूत दिख रही है, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या बाजार इस प्राइस हाइक को स्वीकार करेगा या इससे खरीदारी की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी।
