कोकिंग कोल की कीमतों में **26%** के भारी उछाल के बाद भारतीय स्टील कंपनियों ने भाव **₹2,000 से ₹3,500** प्रति टन तक बढ़ा दिए हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से तो सपोर्ट मिल रहा है, लेकिन **36.6%** बढ़कर आ रहे सस्ते आयात (Imports) कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
लागत का दबाव और कंपनियों का फैसला
कोकिंग कोल की कीमतों में महीने-दर-महीने 26% की जबरदस्त बढ़ोतरी ने स्टील निर्माताओं की कमर तोड़ दी है। इस लागत को कवर करने और अपने मार्जिन को बचाने के लिए ऑटोमोबाइल और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को सप्लाई करने वाली कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट के दाम ₹2,000 से ₹3,500 प्रति टन तक बढ़ा दिए हैं।
अच्छी बात यह है कि मानसून के बाद देश में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी गतिविधियां तेज हो रही हैं, जिससे मांग में सुधार है। साथ ही, हाल ही में कई स्टील मिलों में मेंटेनेंस के चलते सप्लाई भी थोड़ी कम रही है, जिसका फायदा कंपनियों को कीमतों को ऊपर ले जाने में मिल रहा है।
आयात (Imports) से जुड़ी बड़ी चुनौती
हालांकि दाम बढ़ाना मजबूरी है, लेकिन भारतीय कंपनियों के सामने सबसे बड़ी समस्या विदेशों से आ रहे सस्ते स्टील की है। अप्रैल से जुलाई के बीच भारत का स्टील आयात 36.6% बढ़ा है, जिसमें चीन की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। अगर घरेलू कंपनियां बहुत ज्यादा दाम बढ़ाती हैं, तो उन्हें मार्केट शेयर खोने का डर सता रहा है। सरकार की तरफ से 'सेफगार्ड ड्यूटी' लागू होने के बावजूद, सस्ते आयात का वॉल्यूम कंपनियों की प्राइसिंग पावर पर ब्रेक लगा रहा है।
कंपनियों पर क्या होगा असर?
इस उतार-चढ़ाव भरे माहौल में बड़ी कंपनियां जैसे Tata Steel और JSW Steel के पास बेहतर संसाधन हैं, जिससे वे मार्जिन को स्टेबल रख सकती हैं। लेकिन छोटी स्टील कंपनियां, जो स्पॉट मार्केट पर निर्भर हैं, उन्हें कोकिंग कोल की बढ़ी लागत को झेलने में काफी मुश्किल आ रही है।
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी यह देखना होगा कि क्या आने वाले समय में आयात के आंकड़े कम होते हैं या नहीं। अगर आयात का लेवल ऊंचा बना रहा, तो कंपनियों के लिए आगे चलकर दाम बढ़ाना और भी मुश्किल हो जाएगा।
