मॉनसून के दौरान आई गिरावट के बाद अब इंडियन स्टील सेक्टर में रौनक लौट आई है। मांग बढ़ने और सप्लाई कम होने के चलते स्टील की कीमतें **12%** तक बढ़ गई हैं, लेकिन इंपोर्ट का दबाव अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
रिकवरी की असली वजह
मॉनसून के दौरान जून और जुलाई में स्टील की कीमतों में जो गिरावट देखी गई थी, अब वह पूरी तरह खत्म हो गई है। देश भर में इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में आई तेजी की वजह से कीमतों में 12% का उछाल दर्ज किया गया है। बाजार में मांग इतनी ज्यादा है कि कंपनियां जितनी तेजी से कैपेसिटी बढ़ा रही हैं, डिमांड उससे भी तेज रफ्तार से बढ़ रही है। फिलहाल, पूरी इंडस्ट्री का कैपेसिटी यूटिलाइजेशन 90% से ऊपर बना हुआ है, जो डिमांड की मजबूती को दर्शाता है।
इंपोर्ट का दबाव और सरकार की नज़र
मांग मजबूत होने के बावजूद, बाजार में सस्ते विदेशी स्टील का दखल कंपनियों के लिए चिंता का विषय है। भारत फिलहाल स्टील का नेट इंपोर्टर बना हुआ है, जिससे स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स अपनी कीमतों को बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा पा रहे हैं। हालांकि, सरकार इस स्थिति पर नजर रखे हुए है और सस्ते स्टील के डंपिंग को रोकने के लिए एंटी-डंपिंग जांच चल रही है। आने वाले समय में इन सरकारी कदमों का असर कीमतों पर साफ दिखेगा।
रॉ मटेरियल का गणित
मुनाफे की बात करें, तो इनपुट कॉस्ट में मिला-जुला असर दिख रहा है। कोकिंग कोल की कीमतों में सप्लाई के संकट के चलते करीब 5% की बढ़ोतरी हुई है, जिससे प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ रही है। दूसरी तरफ, डोमेस्टिक आयरन ओर फाइन्स (Iron ore fines) के भाव जून के मुकाबले 7% नीचे आए हैं, जो कंपनियों के लिए थोड़ी राहत की खबर है। निवेशकों को अब नजर रखनी चाहिए कि क्या कंपनियां बढ़ती लागत के बीच अपने मार्जिन को बचा पाती हैं या नहीं। अगला बड़ा ट्रिगर कंपनियों के आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स और सरकार के नीतिगत फैसले होंगे।
