जुलाई 2026 में भारत का इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट **$12.24 बिलियन** के स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका और चीन से मिली मजबूत डिमांड ने जहां ग्रोथ को रफ्तार दी है, वहीं पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता लॉजिस्टिक्स के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
भारत के इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट्स ने जुलाई 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए सालाना आधार पर 18% की बढ़ोतरी दर्ज की है। पिछले चार महीनों से निर्यात का आंकड़ा लगातार $10 बिलियन के पार बना हुआ है, जो भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए एक पॉजिटिव संकेत है।
अमेरिका और चीन बने ग्रोथ के इंजन
एक्सपोर्ट्स में यह तेजी मुख्य रूप से अमेरिका और चीन से आई भारी मांग के कारण है। अमेरिका अभी भी भारतीय इंजीनियरिंग सामान का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, जहां निर्यात 20% बढ़कर $2.18 बिलियन हो गया है। वहीं, चीन में भी भारतीय सामान की डिमांड में 32% का उछाल देखा गया है, जो कुल $349 मिलियन तक पहुंच गई है।
पश्चिम एशिया में लॉजिस्टिक्स की चुनौती
एक तरफ जहां पश्चिमी देशों में मांग बढ़ रही है, वहीं पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता चिंता का विषय है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास लॉजिस्टिक्स बाधाओं के कारण डिलीवरी में देरी हो रही है। इसका सीधा असर यूएई (UAE) के एक्सपोर्ट पर पड़ा है, जो 12.1% घटकर $503 मिलियन रह गया है, जबकि सऊदी अरब में निर्यात 5.9% गिरकर $359.3 मिलियन पर आ गया है।
निवेशकों के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती लेकर आई है। शिपिंग लागत और इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ने से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
सेक्टर का हाल और रिस्क
इंजीनियरिंग सेक्टर के 34 में से 27 सेगमेंट में ग्रोथ दिखी है, लेकिन आयरन और स्टील, मशीन टूल्स और एयरक्राफ्ट पार्ट्स जैसे 7 सेगमेंट में गिरावट आई है। बढ़ती सुरक्षावादी नीतियां और एनर्जी कॉस्ट का बढ़ना आने वाले समय में कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं। अब निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या कंपनियां बढ़ी हुई लॉजिस्टिक लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल पाएंगी या फिर इसका सीधा असर उनके तिमाही नतीजों पर दिखेगा।
