Union IT और Railways मंत्री Ashwini Vaishnaw ने 30 मार्च 2026 को एक कड़ा बयान जारी करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम में शामिल कंपनियों को आगाह किया है। उन्होंने कहा, "उद्योग से वैसा समर्थन नहीं मिल रहा है... प्रगति से बहुत खुश नहीं हूँ।" मंत्री ने यह भी साफ कर दिया कि सरकार "कठोर कदम उठाने" के लिए तैयार है, जिसमें नई स्वीकृतियों को रोकना और जारी फंड के वितरण (disbursement) को भी रोक देना शामिल हो सकता है। इस कदम का मुख्य मकसद इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स पर भारत की भारी निर्भरता को कम करना है, जो 2021 में शुरू हुई PLI स्कीम का एक अहम लक्ष्य रहा है।
Vaishnaw ने इस बात पर जोर दिया कि अब सिर्फ उत्पादन (manufacturing) बढ़ाना काफी नहीं होगा। कंपनियों को अपनी इन-हाउस डिज़ाइन क्षमताओं में भारी निवेश करना होगा, वरना उन्हें प्रोग्राम से बाहर किया जा सकता है। यह स्थानीय नवाचार (innovation) और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) को बढ़ावा देने की एक बड़ी पहल है, जो सिर्फ असेंबली (assembly) से आगे बढ़कर वैल्यू-एडिशन पर केंद्रित है। मंत्री ने कंपनियों से एक स्ट्रक्चर्ड रोडमैप बनाने और विश्वविद्यालयों व अन्य फर्मों के साथ मिलकर ज़रूरी स्किल्स विकसित करने का आग्रह किया है। इसका उद्देश्य ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग में भारत की स्थिति को मजबूत करना और इसे सिर्फ एक मैन्युफैक्चरिंग बेस से आगे ले जाकर एक इनोवेशन हब के तौर पर स्थापित करना है।
भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स PLI स्कीम, खासकर मोबाइल फोन सेगमेंट में, ने काफी ग्रोथ देखी है। प्रोडक्शन FY21 में ₹2.13 लाख करोड़ से बढ़कर FY25 में ₹5.45 लाख करोड़ हो गया। सभी PLI स्कीम्स को मिलाकर, दिसंबर 2025 तक कुल निवेश ₹2.16 लाख करोड़ से अधिक रहा, जिससे इस फाइनेंशियल ईयर में लगभग ₹4.20 लाख करोड़ का नया प्रोडक्शन हुआ। अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए, मार्च 2026 तक ₹15,554 करोड़ के इंसेंटिव दिए जा चुके थे। हालांकि, कुल इंसेंटिव भुगतान (payouts) धीमा रहा है। सितंबर 2025 तक, कुल PLI भुगतान ₹23,946 करोड़ था, जो नियोजित राशि का केवल 12% है। सोलर और टेक्सटाइल जैसे अन्य सेक्टर्स में भी इसी तरह की धीमी भुगतान प्रक्रिया और लक्ष्य चूकने के मामले सामने आए हैं, जिससे समीक्षा और संभावित कटौती की चर्चाएं चल रही हैं।
एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में भारत की यह कवायद वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में उथल-पुथल के बीच हो रही है। AI डेटा सेंटरों के लिए कंपोनेंट्स की मांग तेजी से बढ़ रही है, हालांकि अन्य क्षेत्रों में नरमी है। भू-राजनीतिक मुद्दे, शिपिंग में देरी और लॉजिस्टिक्स की बदलती लागतें एक अस्थिर माहौल बना रही हैं। जब ग्लोबल कंपनियां चीन से अपनी सप्लाई चेन को विविधतापूर्ण बनाने ("China+1" Strategy) की कोशिश कर रही हैं, तो भारत वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। आज के बाजार में न केवल कुशल उत्पादन, बल्कि लचीलापन (resilience) और अनुकूलन क्षमता (adaptability) भी महत्वपूर्ण है, जो मजबूत डिज़ाइन और R&D क्षमताओं को स्थायी प्रतिस्पर्धा के लिए ज़रूरी बनाते हैं।
सरकार की यह चेतावनी योजनाओं के क्रियान्वयन (execution) में मौजूद समस्याओं की ओर इशारा करती है। बड़े निवेश के वादों के बावजूद, कार्यान्वयन धीमा रहा है और इंसेंटिव समय पर नहीं दिए गए हैं। PLI स्कीम मूल रूप से डिस्प्ले और PCB जैसे कंपोनेंट्स में घरेलू क्षमता के लिए ₹76,000 करोड़ के निवेश की योजना बनाई गई थी। पिछली PLI स्कीम्स में अक्सर अपेक्षाओं से कम प्रदर्शन देखा गया है, जिसमें कई कंपनियों ने उत्पादन लक्ष्य चूके और सब्सिडी भुगतान में काफी देरी का सामना किया। ₹22,919 करोड़ के बजट वाली इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) ने 22 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है, जिनसे ₹41,863 करोड़ के निवेश की उम्मीद है, ₹2.58 लाख करोड़ के आउटपुट और 37,000 नौकरियों का अनुमान है। मुख्य जोखिम यह है कि जो फर्म केवल असेंबली पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, वे नई डिज़ाइन-केंद्रित आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाएंगी। इससे उन्हें फंडिंग गंवानी पड़ सकती है और एक व्यापक, वैल्यू-एडेड इकोसिस्टम के विकास में बाधा आ सकती है। कुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक प्रोजेक्ट स्वीकृतियों के कारण उत्पादन क्षमताओं के बिखराव की चिंताएं भी हैं।
सरकार इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है, और वह बढ़ी हुई इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) और इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 जैसी पहलों के माध्यम से लगातार समर्थन दे रही है। यह एक पूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने की स्पष्ट दीर्घकालिक योजना को दर्शाता है, जो सिर्फ असेंबली से आगे बढ़कर काम करेगा। हालांकि, मंत्री की चेतावनी इसे स्पष्ट करती है: भविष्य की फंडिंग और भागीदारी इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां डिज़ाइन स्किल्स, R&D खर्च और सहयोग में वास्तविक प्रगति दिखाती हैं। जो कंपनियां इस नए, डिज़ाइन-केंद्रित मानक को पूरा नहीं करेंगी, वे महत्वपूर्ण सरकारी समर्थन खोने का जोखिम उठाएंगी, जिससे भारत के बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग उद्योग में प्रतिस्पर्धा बदल सकती है।