भारत सरकार ने मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों को बड़ी हिदायत दी है। डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स (Department of Pharmaceuticals) ने कंपनियों से कहा है कि वे सिर्फ पुर्जे जोड़ने (Assembly) के बजाय, घरेलू स्तर पर अधिक कंपोनेंट्स का उत्पादन (Domestic Component Production) बढ़ाएं। साथ ही, सरकार ₹3,420 करोड़ की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम की भी समीक्षा कर रही है, ताकि उन दिक्कतों को दूर किया जा सके जिनकी वजह से कई कंपनियां अपना इंसेंटिव क्लेम नहीं कर पा रही हैं।
क्यों बढ़ाई जा रही है लोकल वैल्यू एडिशन की मांग?
शुक्रवार, 21 अगस्त 2026 को डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स ने मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री को डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग पर ज्यादा ध्यान देने को कहा। CII ग्लोबल मेडटेक समिट (CII Global MedTech Summit) में सेक्रेटरी मनोज जोशी ने कहा कि पिछले कुछ सालों में इंडस्ट्री डोमेस्टिक असेंबली की तरफ बढ़ी है, लेकिन कई फैक्ट्रियां असल में डीप-मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स (Deep-Manufacturing Units) की तरह काम करने के बजाय सिर्फ असेंबली लाइन बनकर रह गई हैं।
सरकार कंपनियों के लिए लोकल वैल्यू एडिशन (Local Value Addition) को 40-45% तक बढ़ाने का लक्ष्य तय कर रही है। इसका मकसद सप्लाई चेन को मजबूत बनाना और इंपोर्टेड कंपोनेंट्स (Imported Components) पर निर्भरता कम करना है। ऐसा इसलिए ताकि ग्लोबल सप्लाई चेन में दिक्कतें आने या करेंसी में उतार-चढ़ाव होने पर कंपनियां मुश्किल में न पड़ें।
PLI स्कीम से जुड़ी चुनौतियां
इस पहल का एक अहम हिस्सा मेडिकल डिवाइसेस के लिए PLI स्कीम है। सरकार ने फाइनेंशियल ईयर 2023 से 2027 तक के लिए ₹3,420 करोड़ का फंड रखा है, जो इनक्रीमेंटल सेल्स (Incremental Sales) पर 5% का इंसेंटिव देता है। लेकिन, सेक्रेटरी जोशी ने माना कि कई कंपनियां ऑपरेशनल दिक्कतों या सख्त शुरुआती शर्तों को पूरा न कर पाने की वजह से इन फायदों का लाभ नहीं उठा पा रही हैं।
अब सरकार इंडस्ट्री से सुझाव मांग रही है ताकि इन मसलों को हल किया जा सके। इसमें स्कीम की डेडलाइन बढ़ाना या ऑपरेशनल क्राइटेरिया (Operational Criteria) में बदलाव करना शामिल हो सकता है। सरकार इस फ्रेमवर्क को बेहतर बनाने के लिए तैयार है, ताकि जिन कंपनियों ने कैपेसिटी में निवेश किया है, उन्हें वाकई इंसेंटिव मिल सके।
असेंबली से मैन्युफैक्चरिंग की ओर शिफ्ट
निवेशकों के लिए, असेंबली और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग के बीच का अंतर समझना जरूरी है। सिंपल असेंबली ऑपरेशंस में अक्सर कम प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) होता है और कम कैपिटल (Capital) की जरूरत होती है, लेकिन ये ज्यादा कॉम्पिटिटिव एडवांटेज (Competitive Advantage) नहीं देते। वहीं, डोमेस्टिक लेवल पर क्रिटिकल सेंसर्स, एक्स-रे ट्यूब्स या डिटेक्टर्स जैसे कंपोनेंट्स बनाना ज्यादा मुश्किल काम है। इस बदलाव के लिए एक्सपेंशन (Expansion) और नई टेक्नोलॉजी (New Technology) में भारी निवेश की जरूरत होगी, लेकिन लंबे समय में इससे बेहतर प्रॉफिट मार्जिन और टिकाऊ बिजनेस ग्रोथ मिल सकती है।
हालांकि, इस शिफ्ट में चुनौतियां भी हैं। इंडस्ट्री पर कुछ जरूरी डिवाइसेस, जैसे स्टेंट्स (Stents) पर प्राइस कैप (Price Caps) का दबाव है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ी लागत को संभालना मुश्किल हो सकता है। साथ ही, हाई-टेक इंपोर्टेड कंपोनेंट्स पर निर्भरता अभी भी 40-45% वैल्यू-एडिशन के लक्ष्य को हासिल करने में एक बड़ी रुकावट बनी हुई है। छोटी और उभरती कंपनियों को भी इन नई उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए ऑपरेशंस बढ़ाने में ज्यादा कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Costs) का सामना करना पड़ सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
अगला बड़ा अपडेट PLI स्कीम के नियमों में किसी भी औपचारिक बदलाव या प्रोजेक्ट की टाइमलाइन (Project Timelines) में विस्तार को लेकर होगा। ये बदलाव सीधे तौर पर कंपनियों के पिछले निवेशों से कितना कैश फ्लो (Cash Flow) वसूल कर पाएंगे, इस पर असर डालेंगे। निवेशकों को कंपनियों से इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि वे कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग की ओर कैसे शिफ्ट हो रही हैं, क्योंकि यही उनके लंबे समय तक टिके रहने और कंपीट करने की क्षमता तय करेगा, खासकर ऐसे बाजार में जहां सरकार लगातार हाई लोकल कंटेंट (High Local Content) को बढ़ावा दे रही है।
