स्ट्रैटेजिक जरूरत (The Strategic Imperative)
भारत की बढ़ती हुई मांग, जो हाई-टेक इंडस्ट्रीज़ और ग्रीन एनर्जी के लिए ज़रूरी मिनरल्स पर निर्भर है, उसी को देखते हुए सरकार ने यह अहम पॉलिसी बनाई है। देश खास तौर पर रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) के लिए इंपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जहां ग्लोबल सप्लाई चेन पर कुछ ही देशों का कंट्रोल है।
लिथियम, कोबाल्ट, नियोडिमियम और प्रेजोडिमियम जैसे मिनरल्स इलेक्ट्रिक व्हीकल (EVs), विंड टर्बाइन, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस सिस्टम बनाने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। आने वाले दशक में इन ज़रूरी मैटेरियल्स की ग्लोबल डिमांड में भारी उछाल आने की उम्मीद है, जिससे सप्लाई की कमी हो सकती है।
मिनरल सिक्योरिटी के लिए बजट के ऐलान (Budgetary Thrusts for Mineral Security)
यूनियन बजट 2026-27 में क्रिटिकल मिनरल्स को सुरक्षित करने के लिए कई फ्रंट पर काम किया जाएगा। इस स्ट्रैटेजी का एक अहम हिस्सा ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे मिनरल-समृद्ध राज्यों में डेडिकेटेड रेयर अर्थ गलियारे (corridors) स्थापित करना है। ये गलियारे माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को एक साथ बढ़ावा देंगे।
रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) के मुख्य स्रोत, मोनाजाइट (monazite) पर लगने वाली बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) को 2.5% से घटाकर शून्य कर दिया गया है। इसके अलावा, भारत में क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग के लिए इंपोर्ट किए जाने वाले कैपिटल गुड्स (capital goods) पर भी कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई है।
बजट में यह भी प्रस्ताव है कि कुछ क्रिटिकल मिनरल्स की खोज (prospecting and exploring) पर किया गया खर्च, इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 51 के तहत टैक्स डिडक्शन के लिए एलिजिबल होगा।
सपोर्टिंग पॉलिसीज़ और स्कीम्स (Underpinning Policies and Schemes)
ये बजट घोषणाएं मौजूदा सरकारी पहलों पर आधारित हैं। नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM), जिसे 2025 के अंत में लॉन्च किया गया था, इन महत्वपूर्ण संसाधनों को सुरक्षित करने के लिए एक ढांचा प्रदान करता है। NCMM के लिए लगभग ₹16,300 करोड़ का आउटले (outlay) रखा गया है, और अगले सात सालों में ₹34,300 करोड़ के कुल खर्च का अनुमान है। यह मिशन डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन, रिफाइनिंग और रीसाइक्लिंग पर फोकस करेगा, ताकि पूरे वैल्यू चेन को मजबूत किया जा सके।
इसके अलावा, ₹7,280 करोड़ की एक स्कीम, जिसे 2025 के अंत में मंजूरी मिली थी, सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPMs) के डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देगी। इस REPM स्कीम का लक्ष्य 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी तैयार करना है, जो EV मोटर्स और विंड टर्बाइन के लिए बेहद ज़रूरी है।
सेक्टर पर असर और भविष्य (Sectoral Impact and Future Outlook)
यह रिफॉर्म क्रिटिकल मिनरल्स के लिए एक मजबूत डोमेस्टिक इकोसिस्टम बनाने का साफ संकेत देता है। भारत इंपोर्टर से ग्लोबल वैल्यू चेन्स में एक संभावित सप्लायर बनने की ओर बढ़ेगा। इंपोर्ट पर निर्भरता कम करके, भारत अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी (strategic autonomy) को बढ़ाना चाहता है और ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावटों से अपने प्रमुख उद्योगों को बचाना चाहता है।
पब्लिक सेक्टर की कंपनियां जैसे IREL (India) Limited, जो रेयर अर्थ एक्सट्रैक्शन में माहिर है, और प्राइवेट प्लेयर्स जैसे Vedanta और GMDC, जो एक्सप्लोरेशन और प्रोसेसिंग में शामिल हैं, इन पॉलिसी के फायदों के लिए तैयार हैं। यह कदम भारत के बड़े आर्थिक लक्ष्यों, जैसे ग्रीन एनर्जी, एडवांस मैन्युफैक्चरिंग और नेशनल सिक्योरिटी को भी बढ़ावा देता है। इन पहलों की सफलता एक्सप्लोरेशन से लेकर एंड-प्रोडक्ट मैन्युफैक्चरिंग तक, पूरे मिनरल वैल्यू चेन में प्रभावी कार्यान्वयन (implementation) और निरंतर निवेश पर निर्भर करेगी।