भारत-अमेरिका व्यापार डील: क्या है पूरा मामला?
नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच हुए नए व्यापार समझौते (trade agreement) का मकसद दोनों देशों के बीच लगने वाले आपसी टैरिफ (tariffs) को कम करना था। लेकिन, इस डील के बावजूद भारतीय एक्सपोर्ट्स (exports) का एक बड़ा हिस्सा अभी भी भारी शुल्कों के दायरे में है। एक विश्लेषण से पता चलता है कि भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले कुल एक्सपोर्ट्स का लगभग 10% से ज़्यादा, यानी करीब 8.3 अरब डॉलर का माल 25% या उससे ज़्यादा के टैरिफ का सामना करेगा। ये वो 'राष्ट्रीय सुरक्षा' (national security) से जुड़े टैरिफ हैं जो 'सेक्शन 232' (Section 232) के तहत लगाए गए थे और हालिया द्विपक्षीय समझौते में इन पर ज़्यादा असर नहीं पड़ा है। जबकि आपसी टैरिफ को घटाकर 18% कर दिया गया है, लेकिन 'राष्ट्रीय सुरक्षा' वाले पुराने टैरिफ अब भी भारतीय उद्योगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं।
'सेक्शन 232' का झोल
'सेक्शन 232' के तहत लगने वाले ये टैरिफ अमेरिकी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से महत्वपूर्ण मानी जाने वाली चीज़ों पर लगाए थे। खास तौर पर तब की ट्रंप सरकार ने इन पर ज़ोर दिया था। इन शुल्कों के पीछे की जांच और सिफारिशें ऐसी हैं कि ये विभिन्न व्यापार समझौतों के बावजूद अपनी जगह बनाए हुए हैं। इन टैरिफ के दायरे में स्टील, एल्युमीनियम, ऑटोमोबाइल, लकड़ी, कॉपर और कुछ मशीनरी जैसे उत्पाद आते हैं। भारत के लिए ये टैरिफ एक बड़ी रुकावट हैं, खासकर तब जब अमेरिका इन खास प्रोडक्ट्स के लिए भारत का एक अहम बाज़ार है। इन उत्पादों के कुल अमेरिकी बिक्री में अमेरिका का हिस्सा 22.7% है, जबकि भारतीय एक्सपोर्ट्स के कुल अमेरिकी बिक्री में यह आंकड़ा 18.3% है।
खास सेक्टरों पर भारी बोझ
'सेक्शन 232' के इन टैरिफ का आर्थिक बोझ कुछ खास सेक्टरों पर ही ज़्यादा पड़ रहा है। ऑटोमोबाइल सेक्टर अकेले प्रभावित एक्सपोर्ट्स में सबसे बड़ा हिस्सा है, जहाँ लगभग 3.9 अरब डॉलर के शिपमेंट पर ये टैरिफ लागू हैं। इसके बाद स्टील एक्सपोर्ट्स का नंबर आता है, जिनका मूल्य करीब 2.5 अरब डॉलर है, और एल्युमीनियम शिपमेंट से करीब 800 मिलियन डॉलर का माल प्रभावित है। इन तीनों कैटेगरी को मिला दें तो यह उन भारतीय एक्सपोर्ट्स का 85% से ज़्यादा है जिन पर ये टैरिफ लगे हैं। इस भारी निर्भरता का मतलब है कि छोटे-मोटे व्यापार बाधाएं भी भारतीय उत्पादकों के मुनाफे (profit margins) और कॉम्पिटिशन (competitiveness) पर काफी दबाव डाल सकती हैं। उदाहरण के लिए, 2024 में भारत के कुल वैश्विक स्टील एक्सपोर्ट्स का करीब 34% और एल्युमीनियम एक्सपोर्ट्स का 37% अमेरिका को जाता था, जो इन ट्रेड फ्लो की रणनीतिक अहमियत और कमज़ोरी को दिखाता है।
लगातार आ रही दिक्कतें
'सेक्शन 232' के टैरिफ का जारी रहना अमेरिकी व्यापार नीति की जटिल और अक्सर संरक्षणवादी (protectionist) प्रकृति को दर्शाता है। आर्थिक साझेदारी के व्यापक प्रयासों के बावजूद, ये शुल्क चुनौतियां पेश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारतीय एक्सपोर्टर्स को उन देशों के मुकाबले नुकसान उठाना पड़ रहा है जहाँ उन्हें तरजीही टैरिफ दरें (preferential tariff rates) या छूट मिलती है। इस स्थिति में, भारतीय उत्पादकों को अपने मार्जिन को बचाने और कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए भौगोलिक विविधीकरण (geographic diversification) और लागत दक्षता (cost efficiencies) बढ़ाने जैसे रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं। आगे चलकर, जारी व्यापार वार्ता (trade negotiations) और संभावित नीतिगत बदलाव इस बात को तय करेंगे कि भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों का भविष्य कैसा होगा, खासकर उन सेक्टरों के लिए जो अमेरिकी बाज़ार पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं।