टायर कंपनियों पर महंगाई का डबल अटैक! लागत आसमान पर, इंडस्ट्री ने मांगी सरकार से मदद

INDUSTRIAL-GOODSSERVICES
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
टायर कंपनियों पर महंगाई का डबल अटैक! लागत आसमान पर, इंडस्ट्री ने मांगी सरकार से मदद
Overview

भारतीय टायर इंडस्ट्री इस समय गहरे संकट से गुजर रही है। लगातार बढ़ रही लागत और इंपोर्ट ड्यूटी के बोझ तले दबी इस इंडस्ट्री ने अब सरकार से राहत की गुहार लगाई है।

Instant Stock Alerts on WhatsApp

Used by 10,000+ active investors

1

Add Stocks

Select the stocks you want to track in real time.

2

Get Alerts on WhatsApp

Receive instant updates directly to WhatsApp.

  • Quarterly Results
  • Concall Announcements
  • New Orders & Big Deals
  • Capex Announcements
  • Bulk Deals
  • And much more

पश्चिम एशिया में चल रहे संकट और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण भारतीय टायर इंडस्ट्री की मुश्किलें बढ़ गई हैं। कच्चे माल, जो कुल लागत का 60-70% हिस्सा होते हैं, उनकी कीमतों में भारी उछाल आया है। इसके अलावा, शिपिंग मार्गों पर तनाव के चलते लॉजिस्टिक्स (logistics) भी महंगी हो गई है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए, ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ATMA) सरकार से इंपोर्ट ड्यूटी (import duty) में राहत देने की मांग कर रही है।

ATMA का कहना है कि कार्बन ब्लैक (carbon black) और टायर कॉर्ड फैब्रिक (tyre cord fabric) जैसे प्रमुख कच्चे माल पर अभी भी काफी इंपोर्ट ड्यूटी लग रही है, जिससे इंडस्ट्री की कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) कम हो रही है। कंपनी ने कुछ कच्चे माल जैसे सिंथेटिक रबर (synthetic rubber) और कुछ रेजिन (resins) पर 30 जून 2026 तक कस्टम ड्यूटी (customs duty) में अस्थायी छूट दी है, लेकिन कई अन्य अहम सामग्री, जैसे पॉलिएस्टर/नायलॉन टायर कॉर्ड फैब्रिक, स्टील टायर कॉर्ड, प्रोसेसिंग ऑयल और पेट्रोकेमिकल केमिकल पर अभी भी ऊंचे टैक्स लगे हैं। प्रोडक्शन में रुकावट न आए, इसलिए इंपोर्टेड बीड वायर (bead wire) के लिए क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) से अस्थायी छूट की भी मांग की गई है।

इन लागत दबावों के बावजूद, डोमेस्टिक टायर मार्केट (domestic tyre market) मजबूत बना हुआ है। अनुमान है कि FY26 में यह 7-8% की दर से बढ़ेगा, जिसका मुख्य कारण व्हीकल मैन्युफैक्चरर्स (vehicle manufacturers) और रिप्लेसमेंट मार्केट (replacement market) से आ रही दमदार डिमांड है। हालांकि, एक्सपोर्ट मार्केट (export market) में भारतीय कंपनियों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका, जो भारत के टायर एक्सपोर्ट का लगभग 18% हिस्सा खरीदता है, ने भारतीय टायर इंपोर्ट पर 50% तक टैरिफ (tariff) लगा दिए हैं। इससे थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले भारतीय टायर महंगे हो गए हैं। इस सेक्टर की प्रमुख कंपनियों में MRF Ltd. (P/E ~24.76, Market Cap ~₹55,226 करोड़), Apollo Tyres Ltd. (P/E ~21.2-30.3x), CEAT Ltd. (P/E ~22.73, Market Cap ~₹14,061 करोड़), और JK Tyre & Industries Ltd. (P/E ~16.76x, Market Cap ~₹11,545 करोड़) शामिल हैं।

भारतीय टायर इंडस्ट्री की संरचना में कुछ गहरी कमजोरियां भी हैं। इंपोर्टेड, क्रूड ऑयल (crude oil) पर आधारित मैटेरियल पर भारी निर्भरता इसे ग्लोबल प्राइस स्विंग्स (global price swings) के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। वर्तमान 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' (inverted duty structure) के तहत, नेचुरल रबर (natural rubber), जो एक अहम इनपुट है, पर तैयार टायरों की तुलना में कहीं ज्यादा टैक्स लगता है। यह विसंगति न केवल डोमेस्टिक कॉम्पिटिटिवनेस को कम करती है, बल्कि सस्ते इंपोर्ट को भी बढ़ावा देती है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा (intense competition) के चलते कंपनियों की प्राइसिंग पावर (pricing power) सीमित हो जाती है, जिससे कच्चे माल की लागत बढ़ने पर मार्जिन (margins) पर दबाव आ जाता है।

आगे चलकर, डोमेस्टिक डिमांड और रिप्लेसमेंट मार्केट से मिलने वाले सपोर्ट के दम पर भारतीय टायर इंडस्ट्री में ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है, भले ही लागत दबाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बनी रहें। जो कंपनियां कॉस्ट मैनेजमेंट (cost management) में माहिर होंगी और अमेरिका से हटकर अन्य एक्सपोर्ट मार्केट में डाइवर्सिफाई (diversify) कर सकेंगी, वे लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न दे सकती हैं। इंडस्ट्री का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह बदलती ग्लोबल ट्रेड पॉलिसीज (global trade policies) के अनुकूल कैसे ढलती है और कैसे स्थिर, लागत-प्रभावी कच्चे माल की सप्लाई सुनिश्चित करती है।

Get stock alerts instantly on WhatsApp

Quarterly results, bulk deals, concall updates and major announcements delivered in real time.

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.