भारत अगले 10 वर्षों में दुनिया के टॉप-4 शिपबिल्डिंग देशों में शामिल होने की योजना बना रहा है। इसके लिए सरकार ने **₹69,725 करोड़** का इंसेंटिव पैकेज जारी किया है, जिसका लक्ष्य विदेशी जहाजों पर निर्भरता कम करना है।
ग्लोबल मार्केट में जगह बनाने की चुनौती
फिलहाल वैश्विक शिपबिल्डिंग मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम है, जबकि चीन, दक्षिण कोरिया और जापान मिलकर मार्केट के करीब 95% हिस्से पर कब्जा जमाए हुए हैं। इस बड़े अंतर को पाटने के लिए सरकार ने एक रणनीतिक रोडमैप तैयार किया है, जिसमें देश की स्टील उत्पादन क्षमता का लाभ उठाकर विदेशी शिपिंग लाइनों पर निर्भरता को घटाने पर जोर दिया जा रहा है।
कमर्शियल मार्केट की ओर रुख
₹69,725 करोड़ का यह पैकेज साल 2025 में मंजूर किया गया है। इसका सबसे अहम हिस्सा शिपयार्ड्स को डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स से निकालकर कमर्शियल जहाजों (मर्चेंट शिप्स और ऑयल टैंकर) के निर्माण की ओर मोड़ना है। डिफेंस सेक्टर में जहां तकनीक और स्पेशलाइजेशन मायने रखता है, वहीं कमर्शियल सेगमेंट में लागत में कमी और तेजी से काम पूरा करना (Turnaround time) सबसे जरूरी है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियां जैसे Cochin Shipyard, Mazagon Dock और Garden Reach Shipbuilders & Engineers के लिए यह एक बड़ा बदलाव होगा। इन कंपनियों को अब डिफेंस के सुरक्षित 'कॉस्ट-प्लस' मॉडल से हटकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनना होगा।
हालांकि, राह आसान नहीं है। मरीन इंजन और नेविगेशन इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कंपोनेंट्स के लिए आज भी भारत आयात पर निर्भर है। इन कंपनियों के लिए असली परीक्षा यह होगी कि वे कैसे अपने प्रोडक्शन कॉस्ट को नियंत्रित करती हैं और डिफेंस बैकलाग से कमर्शियल ऑर्डर बुक की तरफ कितनी तेजी से शिफ्ट होती हैं। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में इन कंपनियों के मार्जिन और कमर्शियल ऑर्डर निष्पादन की गति पर पैनी नजर रखनी होगी।
