Shipbuilding Sector: भारत का ग्लोबल लीडर बनने का सपना, ₹53,866 करोड़ के मेगा ऑर्डर से मिली रफ्तार

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AuthorAditya Rao|Published at:
Shipbuilding Sector: भारत का ग्लोबल लीडर बनने का सपना, ₹53,866 करोड़ के मेगा ऑर्डर से मिली रफ्तार

भारत को दुनिया के टॉप 5 शिपबिल्डर्स में शामिल होने के लिए अपने उत्पादन को 11 गुना बढ़ाना होगा। हाल ही में मिले **₹53,866 करोड़** के डिफेंस ऑर्डर्स से कंपनियों को तो बड़ी राहत मिली है, लेकिन लंबी दौड़ के लिए अब कमर्शियल जहाजों के निर्माण पर फोकस करना होगा।

भारत का शिपिंग सेक्टर साल 2047 तक दुनिया के टॉप 5 देशों में शामिल होने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। FICCI और EY की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल भारत की वैश्विक मार्केट में हिस्सेदारी मात्र 0.075% है। चीन, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों को पछाड़ने के लिए भारत को अपने प्रोडक्शन में 11 गुना की बढ़ोतरी करनी होगी।

डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स का दम

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने अपना खजाना खोल दिया है। 2 नवंबर 2026 को रक्षा मंत्रालय ने आठ 'नेक्स्ट जनरेशन कोरवेट्स' के लिए ₹53,866.50 करोड़ के करार पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें Garden Reach Shipbuilders & Engineers (GRSE) और Goa Shipyard Limited (GSL) की बड़ी भूमिका है। अकेले GRSE को ₹32,000 करोड़ के पांच जहाजों का ठेका मिला है।

यह ऑर्डर Mazagon Dock, Cochin Shipyard और GRSE जैसी कंपनियों को अच्छी रेवेन्यू विजिबिलिटी तो देते हैं, लेकिन साथ ही एक बड़ी चुनौती भी सामने खड़ी है। सेक्टर अभी भी सरकारी डिफेंस ऑर्डर्स पर ही निर्भर है। ग्लोबल मार्केट में टिकने के लिए कंपनियों को कमर्शियल जहाजों के प्रोडक्शन में अपनी लागत कम करनी होगी, जहां मुकाबला बेहद कड़ा है।

बड़े होने की राह में चुनौतियां

शिपबिल्डिंग एक कैपिटल-इंटेंसिव बिजनेस है। लंबे कंस्ट्रक्शन साइकिल के चलते कैश फ्लो और वर्किंग कैपिटल पर दबाव बना रहता है। भारत के सामने एक और चुनौती है कि हमारा पुराना मर्चेंट फ्लीट रिटायर हो रहा है, लेकिन फिर भी अधिकांश ऑर्डर्स विदेशी शिपयार्ड्स को मिल रहे हैं। सरकार ने ₹69,725 करोड़ का मैरीटाइम पैकेज और नई फाइनेंसिंग स्कीम जैसे New India Assurance और ECGC का बीमा पेश किया है, ताकि प्रोजेक्ट्स का रिस्क कम हो सके।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

निवेशकों के लिए सबसे बड़ी मॉनिटरेबल चीज है- 'एग्जीक्यूशन स्पीड'। डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स में देरी का सीधा असर प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा। साथ ही, मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखें कि वे कमर्शियल ऑर्डर्स हासिल करने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं। सप्लाई चेन का सही मैनेजमेंट ही यह तय करेगा कि मौजूदा ऑर्डर बुक आगे चलकर मुनाफे में बदलती है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.