केंद्र सरकार ओडिशा और पश्चिम बंगाल को जोड़कर एक इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने की तैयारी में है। इसका लक्ष्य भारत की एल्युमीनियम क्षमता को मौजूदा **4.2 मिलियन टन** से बढ़ाकर **2047** तक **37 मिलियन टन** तक पहुंचाना है, जिससे डिफेंस और ईवी सेक्टर को मजबूती मिलेगी।
बड़ा लक्ष्य और सरकारी रणनीति
केंद्रीय कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने भारत को एल्युमीनियम उत्पादन का ग्लोबल हब बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पेश की है। इस प्लान के तहत ओडिशा के कच्चे माल (Raw Material) और पश्चिम बंगाल की औद्योगिक क्षमता का तालमेल बिठाया जाएगा। भारत का लक्ष्य ग्लोबल मार्केट में अपनी हिस्सेदारी को मौजूदा 3.8% से बढ़ाकर 10% तक ले जाने का है।
प्रमुख कंपनियां और सेक्टर का फोकस
सरकार का मुख्य फोकस केवल कच्चा माल पैदा करने पर नहीं, बल्कि 'डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग' पर है। इसका मतलब है कि एल्युमीनियम से डिफेंस, एयरोस्पेस और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) के लिए हाई-वैल्यू पार्ट्स बनाए जाएंगे। इस विस्तार में NALCO, Hindalco Industries और Vedanta जैसी बड़ी कंपनियां अहम भूमिका निभाएंगी।
सामने चुनौतियां क्या हैं?
37 मिलियन टन की क्षमता हासिल करना आसान नहीं होगा। कुछ बड़ी बाधाएं इस प्रकार हैं:
- ऊर्जा की खपत: एल्युमीनियम स्मेल्टिंग के लिए बहुत अधिक बिजली की जरूरत होती है, जिससे कोयले की उपलब्धता और बिजली की लागत एक बड़ा रिस्क है।
- सप्लाई गैप: सरकारी अनुमानों के मुताबिक, भविष्य में 7 मिलियन टन प्रति वर्ष का सप्लाई गैप रह सकता है।
- लॉजिस्टिक्स: स्मेल्टर्स को चालू रखने के लिए रेलवे कोयला रैक जैसी बुनियादी सुविधाओं में बड़े निवेश की दरकार है।
रेगुलेटरी सुधार और पारदर्शिता
सरकार पश्चिम बंगाल में अवैध खनन पर लगाम लगाने के लिए सख्त कदम उठा रही है, जो लंबे समय से औद्योगिक विकास में एक बड़ी रुकावट रहा है। आने वाले समय में निवेशकों को मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव्स और माइनिंग पॉलिसी में होने वाले बदलावों पर कड़ी नजर रखनी होगी।
