India Steel: भारत बना नेट एक्सपोर्टर, पहली बार निर्यात आयात से ज़्यादा!

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Steel: भारत बना नेट एक्सपोर्टर, पहली बार निर्यात आयात से ज़्यादा!
Overview

भारत ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। देश अब तैयार स्टील का नेट एक्सपोर्टर बन गया है, जिसने पहली बार आयात को पीछे छोड़ दिया है। इस फाइनेंशियल ईयर में **6.6 मिलियन मीट्रिक टन** स्टील का निर्यात किया गया, जबकि **6.5 मिलियन मीट्रिक टन** का आयात हुआ। एक्सपोर्ट्स में जबरदस्त उछाल और इम्पोर्ट्स में आई कमी, घरेलू स्टील प्रोडक्शन और डिमांड में मजबूती के कारण संभव हुआ।

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निर्यात के दम पर भारत बना ग्लोबल प्लेयर

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के तैयार स्टील एक्सपोर्ट्स में साल-दर-साल 35.9% की ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखी गई, जो 6.6 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गई। यह आंकड़ा इसी अवधि में हुए 6.5 मिलियन मीट्रिक टन के आयात से ज़्यादा है। भारत से स्टील की सबसे बड़ी खेप इटली, वियतनाम, बेल्जियम, UAE और स्पेन जैसे देशों को भेजी गई।

घरेलू मोर्चे पर भी स्टील सेक्टर फलता-फूलता दिख रहा है। इस दौरान क्रूड स्टील प्रोडक्शन 10.7% बढ़कर 168.4 मिलियन टन पर पहुंच गया, वहीं फिनिश्ड स्टील कंजम्पशन में 7-8% का इजाफा हुआ और यह 164 मिलियन टन तक पहुंच गया।

ग्लोबल मार्केट में भारत का बढ़ता दबदबा

भारत का नेट एक्सपोर्टर बनना ऐसे समय में हुआ है जब ग्लोबल स्टील इंडस्ट्री ओवरकैपेसिटी (अतिरिक्त उत्पादन क्षमता) और धीमी डिमांड रिकवरी से जूझ रही है। अनुमान है कि ग्लोबल स्टील डिमांड में मामूली बढ़ोतरी होगी, लेकिन प्रोडक्शन कैपेसिटी बढ़ती रहेगी, खासकर भारत और साउथईस्ट एशिया में, जबकि चीन से सप्लाई जारी रहेगी। भारत खुद डिमांड का एक बड़ा जरिया है, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के कारण स्टील डिमांड में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की उम्मीद है। देश की क्षमता 2030 तक 300 मिलियन टन तक पहुंचने का लक्ष्य रखती है, जो घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों जरूरतों को पूरा करेगा। इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन, रेलवे और मैन्युफैक्चरिंग पर सरकारी खर्च से प्रेरित घरेलू कंजम्पशन ग्रोथ, प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान कर रही है।

लागत और व्यापार बाधाएं बढ़ा रहीं चिंता

नेट एक्सपोर्टर बनने के बावजूद, भारतीय स्टील कंपनियों को अपने प्रॉफिट मार्जिन को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कोकिंग कोल जैसे कच्चे माल की बढ़ती लागत और लॉजिस्टिक्स खर्चों में बढ़ोतरी से मार्जिन पर दबाव आ रहा है। ग्लोबल ट्रेड का माहौल भी मुश्किल पैदा कर रहा है। यूरोप का प्रस्तावित कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और सेफगार्ड कोटे में बदलाव 2026 के मध्य से मार्केट एक्सेस को सीमित कर सकते हैं, जिससे EU को होने वाले फ्लैट स्टील एक्सपोर्ट आधे हो सकते हैं। अमेरिकी टैरिफ भी ट्रेड फ्लो को बदल रहे हैं। चीन के प्रोडक्शन से प्रेरित ग्लोबल ओवरसप्लाई, अंतर्राष्ट्रीय कीमतों को कम बनाए हुए है, जिससे उत्पादकों के लिए बढ़ी हुई लागतें ग्राहकों पर डालना मुश्किल हो रहा है।

लगातार विस्तार, पर ग्लोबल कंपटीशन की मार

भारत का स्टील सेक्टर और विस्तार के लिए तैयार है, जिसमें SAIL, Tata Steel और JSW Steel जैसी प्रमुख कंपनियां नई क्षमता और टेक्नोलॉजी में निवेश कर रही हैं। ये निवेश घरेलू डिमांड ग्रोथ में विश्वास दर्शाते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में सरकारी प्रयास भी सकारात्मक आउटलुक को सहारा दे रहे हैं। हालांकि, ग्लोबल कैपेसिटी भी बढ़ रही है, खासकर OECD देशों के बाहर। इससे कीमतों में कमजोरी और कड़ी प्रतिस्पर्धा की स्थिति लंबे समय तक बनी रह सकती है, जो भारत के नेट एक्सपोर्टर स्टेटस की स्थिरता को चुनौती दे सकती है, यदि घरेलू डिमांड बढ़े हुए आउटपुट को सोखने में नाकाम रहती है या निर्यात बाजार और अधिक कठिन हो जाते हैं।

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