India Steel Sector: ₹1 ट्रिलियन के कोयला रिस्क पर इंडस्ट्री! ग्रीन हाइड्रोजन से सस्ता होगा स्टील?

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Steel Sector: ₹1 ट्रिलियन के कोयला रिस्क पर इंडस्ट्री! ग्रीन हाइड्रोजन से सस्ता होगा स्टील?
Overview

भारत का स्टील सेक्टर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसके विस्तार की योजनाओं पर **1 ट्रिलियन डॉलर** से अधिक की कोकिंग कोल (Coking Coal) आयात लागत का भारी जोखिम मंडरा रहा है। इस बड़ी चुनौती से निपटने के लिए, इंडस्ट्री अब ग्रीन स्टील (Green Steel) की ओर कदम बढ़ा रही है, जो घरेलू रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) और ग्रीन हाइड्रोजन (Green Hydrogen) से संचालित होगा। इस बदलाव से न सिर्फ लागत घटेगी, बल्कि करेंसी के उतार-चढ़ाव और ग्लोबल ट्रेड में भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।

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कोयले के ₹1 ट्रिलियन के चक्कर में फंसा स्टील सेक्टर

अगले एक दशक में भारत का स्टील सेक्टर अपनी क्षमता को लगभग दोगुना करने की योजना बना रहा है। लेकिन, एक रिपोर्ट के मुताबिक, पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस (Blast Furnace) पर निर्भरता जारी रखने पर अगले 40 साल में करीब 6 अरब टन कोकिंग कोल का आयात करना पड़ सकता है, जिसकी लागत करीब 1 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग ₹83 लाख करोड़ तक जा सकती है। इस पर निर्भरता से भारत का स्टील उद्योग ग्लोबल कमोडिटी मार्केट (Commodity Market) के उतार-चढ़ाव और करेंसी में बड़े झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाएगा। उदाहरण के लिए, 18 मई 2026 को कोकिंग कोल की कीमत 238 डॉलर प्रति टन थी, जो पिछले साल की तुलना में 26.60% ज्यादा है। यह भारत के इंपोर्ट पर निर्भरता घटाने और औद्योगिक लागत को मजबूत करने के राष्ट्रीय लक्ष्य के बिल्कुल विपरीत है।

ग्रीन स्टील: लागत, करेंसी और ट्रेड में फायदे का सौदा

इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर (IECC) की रिपोर्ट में ग्रीन हाइड्रोजन से बने ग्रीन स्टील को एक बेहतर और रणनीतिक विकल्प बताया गया है। भारत की मजबूत रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) क्षमता ग्रीन हाइड्रोजन के घरेलू उत्पादन में मदद कर सकती है। उम्मीद है कि 2030 तक इसकी लागत घटकर लगभग 3 डॉलर प्रति किलोग्राम हो जाएगी। इससे ग्रीन स्टील का उत्पादन पारंपरिक तरीकों से सिर्फ 5-10% ही महंगा पड़ेगा। भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक लागत को 1.5 डॉलर प्रति किलोग्राम तक लाना है और देश को ग्रीन हाइड्रोजन का ग्लोबल हब बनाना है। कोकिंग कोल, जो कि अमेरिकी डॉलर में तय होता है, के विपरीत ग्रीन हाइड्रोजन के लिए रिन्यूएबल एनर्जी के कॉन्ट्रैक्ट रुपये में किए जा सकते हैं। इससे करेंसी के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलेगी और लंबे समय के लिए लागत स्थिर रहेगी।

यह बदलाव यूरोपीय यूनियन के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे बढ़ते ग्लोबल ट्रेड नियमों को देखते हुए भी बहुत जरूरी है। CBAM के तहत, उन देशों से आने वाले आयात पर कार्बन लेवी लगेगी, जिनकी कार्बन तीव्रता ज्यादा है। इससे 2034 तक भारत के ब्लास्ट फर्नेस से बने स्टील पर 210-243 डॉलर प्रति टन तक का टैक्स लग सकता है। EU 2028 तक 180 स्टील और एल्युमीनियम उत्पादों पर CBAM का दायरा बढ़ाएगा, जिससे मैन्युफैक्चरर्स पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव बढ़ेगा। भारत की नेशनल स्टील पॉलिसी 2017 का भी लक्ष्य 2030 तक कोकिंग कोल आयात को 50% तक कम करना है, जो आत्मनिर्भरता की ओर इशारा करता है।

वैल्यूएशन और छुपे हुए रिस्क

ग्रीन स्टील इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने के लिए भारी कैपिटल इन्वेस्टमेंट (Capital Investment) की जरूरत होगी और यह टेक्नोलॉजी अभी भी पूरी तरह से औद्योगिक उपयोग के लिए विकसित हो रही है। हालांकि ग्रीन स्टील की लागत पारंपरिक स्टील के करीब आ रही है, लेकिन यह अभी भी थोड़ी महंगी है। इसे लागत के बराबर लाने के लिए मजबूत पॉलिसी सपोर्ट और सब्सिडी की जरूरत होगी। भारत की प्रमुख स्टील कंपनियां जैसे Tata Steel (P/E 39.17), JSW Steel (P/E 41.90), और SAIL (P/E 27.75) अपने पिछले औसत और इंडस्ट्री के मुकाबले ऊंचे वैल्यूएशन पर ट्रेड कर रही हैं। ये हाई P/E रेश्यो बताते हैं कि बाजार ने पहले ही काफी ग्रोथ और सफल ट्रांजिशन को अपने भाव में शामिल कर लिया है। ऐसे में, अगर नतीजों में कोई गड़बड़ होती है या ग्रीन स्टील अपनाने में देरी होती है, तो इन शेयरों में बड़ी गिरावट आ सकती है। उदाहरण के तौर पर, JSW Steel का P/E 41.90 है, जो इंडस्ट्री के औसत 28.02 से काफी ऊपर है। यह दिखाता है कि निवेशक भरोसा तो कर रहे हैं, लेकिन अगर कंपनियां उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं तो यह भरोसा नेगेटिव में बदल सकता है। इसके अलावा, भारत अभी भी अपने कोकिंग कोल का लगभग 90% आयात करता है, जो एक बड़ी कमजोरी है। ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में रुकावटें कीमतों में भारी बढ़ोतरी कर सकती हैं, जैसा कि जनवरी 2026 में क्वींसलैंड में बाढ़ के कारण हुआ था, जब बेंचमार्क प्रीमियम हार्ड कोकिंग कोल 252.5 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया था।

सरकारी पॉलिसी और ग्रीन स्टील का भविष्य

सरकारी नीतियों और पब्लिक व प्राइवेट सेक्टर के निवेश के दम पर भारत का स्टील प्रोडक्शन 2030 तक 300 मिलियन टन तक पहुंचने की उम्मीद है। नेशनल स्टील पॉलिसी 2017 टेक्नोलॉजी अपग्रेड, वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स और खास तौर पर लो-कार्बन टेक्नोलॉजी अपनाने को प्राथमिकता देती है। इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन और ऑटोमोटिव से मजबूत डिमांड, साथ ही सस्टेनेबल प्रोडक्शन पर जोर, इंडस्ट्री की लगातार ग्रोथ को सपोर्ट कर रहा है। ग्रीन हाइड्रोजन पहलों को सफलतापूर्वक लागू करना और ट्रेड से जुड़े रिस्क को मैनेज करना, भारत के ग्लोबल स्टील लीडर बनने के विजन, एक्सपोर्ट कंपीटिटिवनेस और एनर्जी सिक्योरिटी को बढ़ाने के लिए अहम होगा।

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