'ग्रीन स्टील' की राह में रोड़े
नेशनल स्टील पॉलिसी 2025 के तहत 400 मिलियन टन उत्पादन क्षमता और 25% कार्बन उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य जितना बड़ा है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। फिलहाल, भारतीय स्टील कंपनियां हर टन स्टील पर औसतन 2.65 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर रही हैं, जो वैश्विक औसत 2 टन से काफी ज़्यादा है। पॉलिसी का मकसद इसे 2035-36 तक घटाकर 2 टन प्रति टन स्टील करना है।
उत्पादन के तरीके और कार्बन फुटप्रिंट
इसकी एक बड़ी वजह भारत में इस्तेमाल होने वाले उत्पादन के तरीके हैं। ज़्यादातर स्टील ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF) रूट से बनता है, जो कार्बन ज़्यादा छोड़ता है। इसकी तुलना में इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) रूट कम कार्बन उत्सर्जित करता है। लेकिन भारत में EAF में भी कोयले पर आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) का इस्तेमाल होता है, जिससे कार्बन फुटप्रिंट बढ़ जाता है। BF-BOF रूट हर टन पर करीब 2.3 टन CO2 उत्सर्जित करता है, जबकि स्क्रैप-आधारित EAF से करीब 0.7 टन CO2 निकलता है।
यूरोपीय संघ का 'कार्बन टैक्स' बड़ा खतरा
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी दबाव बढ़ रहा है। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM), जो जनवरी 2026 से लागू होगा, भारतीय स्टील एक्सपोर्टर्स के लिए बड़ा सिरदर्द बन सकता है। ख़ासकर BF-BOF रूट का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को EU मार्केट में बने रहने के लिए अपने एक्सपोर्ट पर 15% से 22% तक की कीमत घटानी पड़ सकती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: कोयले पर भारी निर्भरता
इस बदलाव में सबसे बड़ी रुकावट इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। भारत में केवल 21% ब्लास्ट फर्नेस क्षमता और 5% DRI क्षमता ही गैस पाइपलाइन से जुड़ी है। ऐसे में कोयले पर निर्भरता बहुत ज़्यादा है, और यह तब और बढ़ जाती है जब 75% बिजली कोयले से बनती है। गैस-आधारित स्टीलमेकिंग और ज़्यादा स्क्रैप के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए बड़े निवेश और नई टेक्नोलॉजी की ज़रूरत है, जिसमें ग्रीन हाइड्रोजन का रास्ता भी शामिल है।
मार्केट परफॉर्मेंस और आगे की राह
इन चुनौतियों के बावजूद, JSW Steel और Tata Steel जैसी बड़ी भारतीय स्टील कंपनियां वित्तीय रूप से मज़बूत हैं। JSW Steel की मार्केट कैप लगभग ₹2.95 ट्रिलियन और Tata Steel की ₹2.56 ट्रिलियन (अप्रैल 2026 तक) है। इनके P/E रेश्यो भी 25-38 के बीच हैं, जो इंडस्ट्री एवरेज के आसपास हैं। JSW Steel के शेयर में हाल ही में तेज़ी देखी गई, वहीं Tata Steel ने भी शानदार एनुअल रिटर्न दिए हैं। एनालिस्ट्स इन दोनों कंपनियों के लिए पॉजिटिव बने हुए हैं।
मांग का अनुमान भी मज़बूत है। 2025 के लिए स्टील की मांग में 8-9% की बढ़ोतरी का अनुमान है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 और 2027 तक जारी रह सकती है। इसका मुख्य कारण सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और कंस्ट्रक्शन सेक्टर है। सेफगार्ड ड्यूटीज़ भी डोमेस्टिक प्रोड्यूसर्स को कैपेसिटी यूटिलाइजेशन बढ़ाने में मदद करेंगी।
आखिरकार, इंडस्ट्री की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे डीकार्बोनाइजेशन की राह और ग्लोबल कार्बन रेगुलेशन को कितनी अच्छी तरह संभाल पाते हैं।