India Steel Sector: एनर्जी सिक्योरिटी पर बड़ा खतरा! 90% आयात पर निर्भरता, क्या होगा आगे?

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AuthorAditya Rao|Published at:
India Steel Sector: एनर्जी सिक्योरिटी पर बड़ा खतरा! 90% आयात पर निर्भरता, क्या होगा आगे?
Overview

भारत का स्टील सेक्टर इस वक्त एक बड़ी एनर्जी सिक्योरिटी चुनौती का सामना कर रहा है। सेक्टर अपनी मेटालर्जिकल कोल (Metallurgical Coal) की **90%** जरूरतें आयात से पूरी करता है। स्टील कैपेसिटी की **64%** नई क्षमता कोयले पर निर्भर है, जो इस आयात पर निर्भरता को और बढ़ाएगी और ग्लोबल कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति इंडस्ट्री को और संवेदनशील बनाएगी।

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स्टील सेक्टर का बढ़ता कोयला

भारत का लक्ष्य 2030 तक क्रूड स्टील कैपेसिटी को बढ़ाकर 300 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) तक पहुंचाना है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मेटालर्जिकल कोल की मांग में काफी बढ़ोतरी होगी।

आने वाली 382 MTPA क्षमता का 64% हिस्सा कोयला-आधारित ब्लास्ट फर्नेस (Blast Furnace) टेक्नोलॉजी का उपयोग करेगा। अकेले यह नियोजित विस्तार 140 MTPA अतिरिक्त कोयले की मांग पैदा कर सकता है। स्टील के प्रति टन के लिए औसतन 770 किलोग्राम कोयले की जरूरत को देखते हुए, यह मौजूदा सप्लाई स्तरों को लगभग दोगुना कर देगा।

घरेलू सप्लाई की कमी और आयात पर निर्भरता

'मिशन कोकिंग कोल' जैसी पहलों के बावजूद, भारत के घरेलू कोयला भंडार में स्टील बनाने के लिए उपयुक्त कोयले की कमी है, क्योंकि इसका ऐश कंटेंट (Ash Content) काफी ज्यादा होता है। इसी वजह से देश को अपने मेट कोल का करीब 90% आयात करना पड़ता है। हालांकि, सप्लाई में विविधता लाने के प्रयासों के तहत अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर बन गया है, जिसने FY21 में 8% से बढ़कर FY25 तक लगभग 15% हिस्सेदारी हासिल कर ली है। लेकिन, यह भी सिर्फ एक सीमित राहत है।

ग्लोबल अस्थिरता और सप्लाई चेन के जोखिम

सप्लायर्स बदलने से भारत ग्लोबल कीमतों के उतार-चढ़ाव से नहीं बच सकता। ऑस्ट्रेलिया सी-बोर्न मेट कोल का प्रमुख निर्यातक बना हुआ है, जो प्रभावी रूप से वैश्विक कीमतें तय करता है।

2026 की शुरुआत में क्वींसलैंड (Queensland) में आई बाढ़ जैसी घटनाओं ने बेंचमार्क कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया था, जो बाजार की संवेदनशीलता को दर्शाता है। अमेरिकी कोयले की कीमतें भी इसके साथ बढ़ीं, जो बाजार की आपसी जुड़ाव को उजागर करता है। जलवायु-संबंधी व्यवधानों से इन सप्लाई जोखिमों और कीमतों में अस्थिरता के और बढ़ने की उम्मीद है।

लॉजिस्टिकल और तकनीकी बाधाएं

लॉजिस्टिकल चुनौतियां अमेरिकी कोयले का उपयोग करने के फायदों को सीमित करती हैं। ऑस्ट्रेलिया से 20-25 दिनों की तुलना में, शिपमेंट को भारत पहुंचने में 40-45 दिन लगते हैं, जिससे माल ढुलाई की लागत और अनिश्चितता बढ़ जाती है। पश्चिम एशिया संकट ने शिपिंग ईंधन की लागत को और प्रभावित किया है। इसके अलावा, अमेरिका की एक्सपोर्ट कैपेसिटी सीमित है और इसके घटने की उम्मीद है, जिससे एक दीर्घकालिक विकल्प के रूप में इसकी क्षमता कमजोर हो रही है।

तकनीकी बाधाएं भी भूमिका निभाती हैं, क्योंकि भारतीय स्टील निर्माता तेजी से स्टैंप-चार्जिंग (Stamp-charging) तकनीक अपना रहे हैं जो घरेलू और ऑस्ट्रेलियाई कोयले के मिश्रण के साथ सबसे अच्छा काम करती है। यह कई प्लांट्स में अमेरिकी कोयले के उपयोग को सीमित करता है।

आगे का रास्ता

IEEFA (Institute for Energy Economics and Financial Analysis) ने एनर्जी सिक्योरिटी को बेहतर बनाने के लिए आयातित कोयले पर निर्भरता कम करने की सिफारिश की है। संस्थान इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (Electric Arc Furnace) में स्क्रैप मेटल (Scrap Metal) का उपयोग करके स्टील बनाने की प्रक्रिया को तेज करने और ग्रीन हाइड्रोजन (Green Hydrogen) उत्पादन का विस्तार करने का सुझाव देता है। इन विकल्पों की ओर रणनीतिक बदलाव के बिना, केवल सप्लायर्स को बदलने से सेक्टर के मूल एनर्जी सिक्योरिटी मुद्दे हल नहीं होंगे।

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