भारत का **300 मिलियन टन** स्टील उत्पादन का लक्ष्य Manganese Ore की कमी के कारण संकट में पड़ सकता है। विदेशी आयात पर निर्भरता और घरेलू माइनिंग नीलामी में महंगे प्रीमियम ने स्टील कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
भारत का स्टील सेक्टर 2030 तक सालाना 300 मिलियन टन स्टील उत्पादन के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। हालाँकि देश में आयरन ओर और कोयला प्रचुर मात्रा में है, लेकिन अब Manganese Ore की कमी एक बड़ी बाधा बनकर उभरी है, जो स्टील की मजबूती के लिए एक अनिवार्य घटक है।
आयात पर निर्भरता और कीमतों का रिस्क
आयरन ओर के उलट, भारत अपनी जरूरत का लगभग 60 से 65 प्रतिशत Manganese Ore आयात करता है। इसमें साउथ अफ्रीका, गैबॉन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर बड़ी निर्भरता है। यह स्थिति दोतरफा मार कर रही है। पहली, ग्लोबल मार्केट में कीमतों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय कंपनियों की प्रोडक्शन कॉस्ट पर पड़ता है। दूसरी, दुनिया भर में रिसोर्स सिक्योरिटी को लेकर बढ़ती सख्ती भविष्य में इस सप्लाई को और भी अनिश्चित बना सकती है।
माइनिंग ऑक्शन प्रीमियम की चुनौती
आयात के अलावा, घरेलू स्तर पर माइनिंग ब्लॉक की नीलामी भी कंपनियों के लिए सिरदर्द बनी है। ओडिशा जैसे राज्यों में हालिया नीलामी में बहुत ऊंचे प्रीमियम पर माइनिंग ब्लॉक आवंटित किए गए हैं। जब कंपनियां खान हासिल करने के लिए भारी रकम चुकाती हैं, तो यह एक फिक्स्ड कॉस्ट के रूप में कंपनी की बैलेंस शीट पर बोझ बन जाता है। अगर स्टील की कीमतें गिरती हैं, तो यह बोझ मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
ग्रीन ट्रांजिशन और बढ़ता खर्च
इन चुनौतियों के बीच कंपनियों पर EU (यूरोपीय संघ) के Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) का दबाव भी है। यूरोप को स्टील एक्सपोर्ट करने के लिए कंपनियों को अपना कार्बन फुटप्रिंट कम करना होगा, जिसके लिए सोलर पावर और वेस्ट-हीट रिकवरी सिस्टम जैसे ग्रीन प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत है।
निवेशकों के लिए आने वाली तिमाहियों में ग्लोबल Manganese कीमतों पर नजर रखना बहुत जरूरी होगा, क्योंकि ये सीधे ऑपरेटिंग मार्जिन को प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, कंपनियां ग्रीन टेक्नोलॉजी और मुख्य विस्तार के बीच फंड का आवंटन कैसे करती हैं, यह उनकी भविष्य की कमाई और कर्ज के स्तर को तय करेगा।
