चालू फाइनेंशियल ईयर के पहले पांच महीनों में भारत का स्टील आयात **38.3%** बढ़कर **₹36,193.9 करोड़** हो गया है। देश में प्रोडक्शन ज्यादा होने के बावजूद, हाई-एंड स्टील की कमी के कारण हमें विदेशी आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
भारत के स्टील सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती सामने आई है। चालू फाइनेंशियल ईयर के अप्रैल से अगस्त के बीच देश ने 3.48 मिलियन टन फिनिश्ड स्टील का आयात किया है, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 29.5% ज्यादा है। यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय कंपनियां देश में बढ़ रही हाई-क्वालिटी स्टील की मांग को पूरा करने में अभी भी पीछे हैं।
आयात कहां से हो रहा है?
भारत में आने वाला ज्यादातर स्टील हॉट-रोल्ड कॉइल्स, कोल्ड-रोल्ड शीट्स और गैल्वेनाइज्ड स्टील है, जिसका इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, कंज्यूमर अप्लायंसेज और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में होता है। यह माल मुख्य रूप से चीन, कोरिया, जापान, इंडोनेशिया और वियतनाम से आ रहा है। घरेलू निवेशकों के लिए चिंता की बात यह है कि विदेशी कंपनियां कीमतों और क्वालिटी, दोनों मोर्चों पर भारतीय बाजार में दबदबा बना रही हैं।
घरेलू कंपनियों पर दबाव
Tata Steel, JSW Steel, Jindal Steel & Power और SAIL जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती पेश कर रही है। एक तरफ उन्हें अंतरराष्ट्रीय कीमतों से मुकाबला करना पड़ रहा है, जो उनके प्रॉफिट मार्जिन को निचोड़ रही हैं। अगर ये कंपनियां हाई-एंड स्टील सेगमेंट में पकड़ नहीं बना पाईं, तो उनका प्रीमियम मार्जिन कम हो सकता है। भले ही भारतीय स्टील का एक्सपोर्ट 34.1% बढ़कर 2.98 मिलियन टन हुआ है, लेकिन कुल एक्सपोर्ट की वैल्यू इंपोर्ट बिल से अभी भी काफी कम है।
निवेशकों के लिए आगे की राह
सरकार ने इस खाई को पाटने के लिए ₹6,322 करोड़ की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम शुरू की है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी कैपेसिटी बढ़ाने में कितनी तेजी दिखाती हैं। साथ ही, अगर सस्ते आयात का सिलसिला जारी रहा, तो सरकार भविष्य में एंटी-डंपिंग ड्यूटी या क्वालिटी कंट्रोल जैसे कड़े कदम उठा सकती है, जिसका असर स्टील सेक्टर के शेयरों पर साफ देखने को मिलेगा।
