वित्तीय वर्ष 2027 की पहली तिमाही (Q1 FY27) के नतीजे मिले-जुले रहे। भारत की सोलर मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियों में, जिन्होंने खुद के सेल बनाए, उन्होंने शानदार मुनाफा कमाया। Premier Energies जैसी कंपनियों ने अच्छा प्रदर्शन किया, वहीं Vikram Solar और Waaree Energies को मार्जिन पर दबाव झेलना पड़ा।
सोलर कंपनियों के नतीजे: किसकी चमक फीकी, किसकी तेज?
वित्तीय वर्ष 2027 की पहली तिमाही (Q1 FY27) में भारत की सोलर मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियों के नतीजे काफी अलग-अलग रहे। हालांकि यह सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अपने स्तर पर सोलर सेल बनाने की क्षमता (जिसे बैकवर्ड इंटीग्रेशन भी कहते हैं) ही मुनाफे और घाटे के बीच का अंतर साबित हुई है।
Premier Energies और Emmvee का जलवा
Premier Energies और Emmvee Photovoltaic Power जैसी कंपनियों ने इस तिमाही में शानदार ग्रोथ दर्ज की है। खुद के सेल बनाने की सुविधा होने के कारण, इन कंपनियों को महंगे इंपोर्ट पर निर्भरता कम करनी पड़ी। Premier Energies का मुनाफा 53% बढ़कर ₹472 करोड़ हो गया। इस कुशलता के दम पर वे मॉड्यूल की बिक्री से बेहतर मुनाफा कमाने में सफल रहे, जबकि उनके प्रतिस्पर्धियों को बाहरी सप्लायर पर निर्भर रहना पड़ा।
Vikram Solar और Waaree Energies को झटका
दूसरी ओर, जिन कंपनियों के पास खुद की सोलर सेल बनाने की पर्याप्त क्षमता नहीं थी, उनके लिए यह तिमाही मुश्किल भरी रही। Vikram Solar का रेवेन्यू 38% बढ़कर ₹1,563 करोड़ होने के बावजूद, नेट प्रॉफिट में 85% की भारी गिरावट आई और यह सिर्फ ₹20 करोड़ रह गया। खुद के सेल न होने के कारण कंपनी को बाजार भाव पर कंपोनेंट्स खरीदने पड़े, जिससे मॉड्यूल की कीमतों में गिरावट आने पर उन्हें भारी नुकसान हुआ। नतीजा यह हुआ कि उनके ऑपरेटिंग मार्जिन घटकर सिर्फ 8% रह गए।
Waaree Energies को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा और वे एनालिस्ट के अनुमानों पर खरे नहीं उतरे। कंपनी को पुराने स्टॉक की ऊंची लागत और एक्सपोर्ट में आई मंदी से जूझना पड़ा, जिसने उनके प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित किया।
आगे क्या?
भारत का सोलर सेक्टर बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2026 के पहले छह महीनों में ही 27 GW की क्षमता जोड़ी गई है। इस तेजी का मुख्य कारण सरकारी ALMM-II पॉलिसी की 1 जून, 2026 की डेडलाइन को पूरा करने की जल्दबाजी थी। लेकिन इस तेज ग्रोथ ने एक प्रतिस्पर्धी माहौल बनाया है, जहाँ सप्लाई चेन पर मजबूत पकड़ रखने वाली कंपनियों को सीधा फायदा मिल रहा है।
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना कोई रातों-रात होने वाला काम नहीं है। स्थापित कंपनियों को भी नई यूनिट को पूरी क्षमता से चलाने में 3 से 4 तिमाही लग जाती हैं। आने वाले समय में, यह देखना अहम होगा कि ये कंपनियां अपनी लागत कम करने के लिए इन-हाउस सेल और वेफर प्रोडक्शन को कितनी तेजी से बढ़ा पाती हैं। इसके अलावा, इन्वेंटरी मैनेजमेंट और घरेलू बाजार में प्राइस वॉर (price war) से निपटना भी शेयरधारकों के लिए महत्वपूर्ण होगा।
