भारत के छोटे हथियारों के निर्यात (Small Arms Exports) में जबरदस्त उछाल आया है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 तक यह आंकड़ा ₹778.72 करोड़ (FY19) से बढ़कर ₹7,215.74 करोड़ हो गया है। इस ग्रोथ का श्रेय प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भागीदारी और रक्षा निर्माण में सरकारी सुधारों को जा रहा है।
Detailed Coverage
प्राइवेट सेक्टर की बढ़ी भागीदारी और ग्लोबल डिमांड
रक्षा निर्यात के क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों ने सिर्फ कंपोनेंट्स बनाने से आगे बढ़कर अब एडवांस्ड हथियार डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग में भी अपनी धाक जमाई है। बेंगलुरु की SSS Defence जैसी कंपनियों ने विदेशी कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल किए हैं, जिनमें आर्मेनिया के रक्षा मंत्रालय को स्नाइपर राइफल्स और फ्रांस को सप्रेस्सर्स की सप्लाई शामिल है। कंपनी अगले साल करीब 1,00,000 हथियार एक्सपोर्ट करने की योजना बना रही है, जिसके लिए उसके पास पहले से 40,000 यूनिट्स का ऑर्डर बुक है। इसी तरह, Zen Technologies अपने कॉम्बैट ट्रेनिंग सिमुलेटर के साथ 30 से अधिक देशों में अपनी पहचान बना चुकी है, और अब उसके कुल रेवेन्यू का लगभग 38% एक्सपोर्ट से आता है।
भौगोलिक रूप से देखें तो, रोमानिया और स्लोवेनिया जैसे यूरोपीय देशों में भारतीय रक्षा उपकरणों की मांग बढ़ी है, जबकि आर्मेनिया और नेपाल से भी लगातार मांग बनी हुई है। अमेठी में बन रही AK-203 राइफल्स की इंडो-रशियन ज्वाइंट वेंचर कंपनी भी 2026 में अफ्रीका और पश्चिम एशिया के बाजारों को टारगेट करते हुए अपने पहले इंटरनेशनल शिपमेंट शुरू करने की उम्मीद कर रही है।
इंडस्ट्री की राह में रोड़े और रिस्क
इस शानदार ग्रोथ के बावजूद, यह सेक्टर कुछ स्ट्रक्चरल चुनौतियों का सामना कर रहा है। सरकारी डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) अभी भी कुल उत्पादन का लगभग 75% कंट्रोल करती हैं, जिससे प्राइवेट प्लेयर्स के लिए मार्केट शेयर सीमित हो जाता है। इसके अलावा, अप्रत्याशित प्रोक्योरमेंट साइकल्स और लाइसेंसिंग की लंबी प्रक्रियाएं बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं। उदाहरण के लिए, Lokesh Machines ने अपनी ASMI सबमशीन गन के लाइसेंस के लिए तीन साल का इंतजार किया, जो कि नए प्लेयर्स के लिए रेगुलेटरी देरी के रिस्क को दर्शाता है।
निवेशकों के लिए, इस ग्रोथ स्टोरी की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार लाइसेंसिंग को कितना आसान बनाती है और प्राइवेट सेक्टर अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी को कितना बढ़ा पाता है। भविष्य में नए एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट्स की टाइमिंग, मौजूदा ऑर्डर बुक्स का पूरा होना और बिजनेस को आसान बनाने वाली किसी भी पॉलिसी शिफ्ट पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, लिस्टेड कंपनियों के कुल रेवेन्यू में एक्सपोर्ट का कितना योगदान है, इस पर नजर रखना घरेलू प्रोक्योरमेंट पर उनकी निर्भरता को समझने के लिए ज़रूरी है।
