भारत सरकार अब पुराने जहाजों (decommissioned ships) से निकाले गए स्टील के लिए नए टेस्टिंग और क्लासिफिकेशन नियम तैयार कर रही है। इस कदम से रीसाइकिल्ड मेटल को बेसिक स्क्रैप से ऊपर उठाकर इंडस्ट्रियल इस्तेमाल के लायक बनाया जाएगा।
भारत सरकार के मिनिस्ट्री ऑफ स्टील और मिनिस्ट्री ऑफ पोर्ट्स, शिपिंग एंड वाटरवेज ने अब पुराने जहाजों से निकलने वाले स्टील के लिए एक नया रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने का काम शुरू कर दिया है। इसका मुख्य मकसद स्टील को लो-वैल्यू स्क्रैप की कैटेगरी से निकालकर हाई-स्पेसिफिकेशन इंडस्ट्रियल यूज तक ले जाना है।\n\n### क्वालिटी और ट्रस्ट की कमी
मौजूदा समय में पुराने जहाजों से निकले स्टील को क्लासिफाई करने का कोई एक समान सिस्टम नहीं है। इससे मैन्युफैक्चरर्स को क्वालिटी पर भरोसा करने में मुश्किल होती है। नए स्टील के उलट, जहाजों से निकला स्टील काफी असंगत (inconsistent) होता है, क्योंकि समुद्री पानी में दशकों रहने के कारण इनमें जंग और मरम्मत के निशान होते हैं। अभी तक यह तय करना मुश्किल था कि कौन सा स्टील स्ट्रक्चरल काम के लायक है और कौन सा सिर्फ री-मेल्टिंग के लिए।\n\n### भारत की बड़ी भूमिका
यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत ग्लोबल शिप-रीसाइक्लिंग मार्केट में 35.4% हिस्सेदारी रखता है। फाइनेंशियल ईयर 2024 में देश में फेरस स्क्रैप की डिमांड 33.36 मिलियन टन तक पहुंच गई है। गुजरात का अलंग-सोसिया (Alang-Sosiya) इंडस्ट्रियल हब इस बिजनेस का केंद्र है। नए प्रोटोकॉल से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि केवल सर्टिफाइड और सुरक्षित स्टील ही इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल हो।\n\n### निवेशकों के लिए संकेत
इस बदलाव से स्क्रैप की प्राइसिंग और बिक्री के तरीके में बड़ा सुधार आ सकता है। अगर यह टेस्टिंग स्टैंडर्ड सफल रहता है, तो रीसायकलर्स बेहतर ग्रेड का मटेरियल बेचकर अधिक मुनाफा कमा सकेंगे। अब बाजार की नजर सरकार की फाइनल गाइडलाइंस पर है कि वे बिना लागत बढ़ाए इस सिस्टम को कैसे लागू करती हैं।
