लॉजिस्टिक्स की मार, रिटेल पर भारी
भारत का ऑर्गनाइज्ड रिटेल मार्केट (organized retail market) 2030 तक $1.6 ट्रिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, लेकिन इसे पुराने आंतरिक लॉजिस्टिक्स की वजह से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। जहां कस्टमर डिलीवरी (customer delivery) स्मूथ है, वहीं वेयरहाउस (warehouse) और स्टोर्स के बीच इन्वेंट्री की मूवमेंट बेहद धीमी है।
इन्वेंट्री में देरी का बड़ा खेल
इस धीमी मूवमेंट की वजह से कैपिटल (capital) फंस जाता है और बिक्री का मौका हाथ से निकल जाता है। एक फैशन ब्रांड के 150 स्टोर्स में, इन्वेंट्री रिटर्न का समय 13 दिनों तक बढ़ गया, जिससे ₹2.6 करोड़ का कैपिटल ब्लॉक हो गया। फैशन साइकल्स (fashion cycles) के 15-20 दिनों तक सिमटने के साथ, स्टॉक अपने डेस्टिनेशन तक पहुंचने से पहले ही पुराना हो सकता है। कॉम्प्लेक्स रिटेल नेटवर्क (complex retail network) और ओमनीचैनल (omnichannel) के बढ़ते चलन के कारण मैनुअल सिस्टम पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे इनवॉइस एरर (invoice errors) 10-15% तक हो सकते हैं और पीक टाइम (peak times) में 8-12% तक की सेल्स (sales) लॉस (loss) हो सकती है।
ऑटोमेशन ही है रिटेल लॉजिस्टिक्स का फ्यूचर
आज भी 85% ब्रांड्स आंतरिक लॉजिस्टिक्स के लिए ईमेल और स्प्रेडशीट का इस्तेमाल करते हैं, जो ऑटोमेटेड सिस्टम (automated systems) की तुलना में 5 गुना धीमे हैं। वहीं, लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री डिजिटाइज (digitize) हो रही है, जिसमें AI और मशीन लर्निंग (Machine Learning) अहम भूमिका निभा रहे हैं। ClickPost जैसी कंपनियां जो हर महीने 50 मिलियन से ज्यादा शिपमेंट्स (shipments) हैंडल करती हैं, AI टूल्स विकसित कर रही हैं। Shiprocket, Ecom Express, और Locus जैसी कंपनियां भी AI- पावर्ड रूट प्लानिंग (route planning) और सप्लाई चेन विजिबिलिटी (supply chain visibility) दे रही हैं।
छिपे हुए खर्चे और चूके अवसर
मैनुअल लॉजिस्टिक्स (manual logistics) के कारण भारतीय रिटेलर्स कई तरह के नुकसान झेल रहे हैं। इन्वेंट्री धीरे चलने पर आउट-ऑफ-सीज़न (out-of-season) हो सकती है। इसके अलावा, फैशन और इलेक्ट्रॉनिक्स में रिटर्न रेट (return rates) काफी ज्यादा है – फैशन में 30-35% और इलेक्ट्रॉनिक्स में 20%। रिवर्स लॉजिस्टिक्स (reverse logistics) की इनएफिशिएंसी (inefficiency) शुरुआती डिलीवरी से 1.5 गुना महंगी पड़ रही है। भारत में कैश-ऑन-डिलीवरी (Cash-on-Delivery - COD) रिजेक्शन (rejections) का दर भी लगभग 26% है, जो रिटर्न को और जटिल बना देता है। ये सब मिलकर व्यक्तिगत ब्रांड्स को सालाना ₹5 करोड़ से ₹15 करोड़ तक का नुकसान पहुंचा सकते हैं।
फ्यूचर ग्रोथ की दौड़
रिटेल में कॉम्पिटिटिव एज (competitive edge) अब इस बात पर निर्भर करेगा कि ऑपरेशन (operations) कितने तेज हैं। FY34 तक भारत का रिटेल मार्केट $2.4 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में AI और एडवांस ऑटोमेशन (automation) का इस्तेमाल सप्लाई चेन (supply chain) के लिए बेहद जरूरी होगा। नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी (National Logistics Policy) जैसी सरकारी पहलों से भी लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने में मदद मिल रही है। कस्टमर सर्विस (customer service) के साथ-साथ आंतरिक ऑपरेशंस (internal operations) को भी आधुनिक बनाना रिटेलर्स के लिए समय की मांग है।