सरकार ने सस्ते विदेशी स्टील पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से इनकार कर दिया है। इंपोर्ट में **29.5%** की भारी बढ़ोतरी के बावजूद, सरकार निर्माण और ऑटो सेक्टर की लागत को कम रखना चाहती है। निवेशकों के लिए यह खबर मार्जिन (Margin) को लेकर चिंता बढ़ा सकती है।
भारत के स्टील मंत्रालय ने स्टील आयात पर किसी भी तरह का नया ट्रेड बैरियर लगाने से साफ इनकार कर दिया है। घरेलू कंपनियां लंबे समय से सरकार से मांग कर रही थीं कि सस्ते विदेशी स्टील, खासकर चीन से आने वाले माल पर ड्यूटी बढ़ाई जाए, क्योंकि इससे उनका मार्केट शेयर और मुनाफा प्रभावित हो रहा है।
आयात का बढ़ता दबाव
आंकड़े बताते हैं कि चालू फाइनेंशियल ईयर में भारत फिनिश्ड स्टील का नेट इंपोर्टर बन गया है। अप्रैल से अगस्त के बीच स्टील का आयात 29.5% बढ़कर 35 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया है। कुल आयात में अकेले चीन की हिस्सेदारी लगभग 32% है। Tata Steel और JSW Steel जैसी दिग्गज कंपनियों का कहना है कि इतने सस्ते माल के आगे उनके लिए प्राइस कॉम्पिटिशन में टिकना मुश्किल हो रहा है।
सरकार ने क्यों ठुकराई मांग?
सरकार का रुख बिल्कुल स्पष्ट है—वह चाहती है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए स्टील की कीमतें किफायती बनी रहें। सरकार को डर है कि ड्यूटी बढ़ाने से निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ जाएगी, जिससे महंगाई को बढ़ावा मिल सकता है।
कंपनियों के लिए चुनौती और निवेशकों के लिए सीख
अब घरेलू कंपनियों के सामने दोहरी चुनौती है: एक तरफ विदेशी सस्ता माल है, तो दूसरी तरफ कोकिंग कोल और स्क्रैप जैसी चीजों की बदलती कीमतें। हालांकि, ऑटो सेक्टर में सितंबर में 31.8% की बिक्री वृद्धि और मजबूत इंफ्रा डिमांड राहत की बात है, लेकिन अब कंपनियों को अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स पर फोकस करना होगा।
निवेशकों को अब कंपनियों के अगले तिमाही नतीजों पर पैनी नजर रखनी चाहिए। अगर ग्लोबल लेवल पर स्टील की कीमतें और गिरती हैं, तो घरेलू कंपनियों के मार्जिन में कमी आना तय है। इसके अलावा, यूरोप या यूके जैसे देशों के कार्बन-संबंधित नियमों पर भी नजर रखना जरूरी है, जो भविष्य में एक्सपोर्ट के अवसरों को प्रभावित कर सकते हैं।
