ग्लोबल स्टील समिट में भारत की अहम बैठकें
भारत अपनी स्टील इंडस्ट्री की सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है। 'भारत स्टील 2026' समिट, जो नई दिल्ली में आयोजित होने वाला देश का सबसे बड़ा इंटरनेशनल स्टील कॉन्फ्रेंस और एग्जीबिशन है, उसमें भारत अर्जेंटीना, इंडोनेशिया और ओमान के साथ महत्वपूर्ण चर्चाएं करेगा। इन बैठकों का मुख्य लक्ष्य घरेलू बढ़ती मांग को पूरा करना और भारत के क्लीन एनर्जी (Clean Energy) लक्ष्यों को समर्थन देना है, जिसके लिए बैटरी टेक्नोलॉजी हेतु ज़रूरी मिनरल्स की सप्लाई सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। हालांकि, ये प्रयास ऐसे समय में हो रहे हैं जब सेक्टर ग्लोबल अस्थिरता और सप्लाई चेन की चुनौतियों का सामना कर रहा है।
इन देशों से क्या चाहता है भारत?
इंडोनेशिया, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा निकेल ओर (Nickel Ore) का भंडार है, भारत के लिए एक प्रमुख लक्ष्य है। वहीं, ओमान आयरन ओर का भारत के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसके लिए दोनों देशों के बीच माइनिंग सहयोग बढ़ाने का द्विपक्षीय समझौता पहले से मौजूद है। दूसरी ओर, अर्जेंटीना लिथियम (Lithium) का प्रमुख वैश्विक उत्पादक है, जो भारत के बढ़ते इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और रिन्यूएबल एनर्जी स्टोरेज (Renewable Energy Storage) सेक्टर्स के लिए महत्वपूर्ण है। ये बातचीत भारत के जनवरी 2025 के उस लक्ष्य के अनुरूप हैं, जिसमें लिथियम, कोबाल्ट और रेअर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की स्थिर सप्लाई सुनिश्चित करना शामिल है, ताकि स्टील प्रोडक्शन और एनर्जी ट्रांजीशन (Energy Transition) को बढ़ावा दिया जा सके।
भारत का स्टील उत्पादन और बढ़ती आयात की ज़रूरत
दुनिया के दूसरे सबसे बड़े क्रूड स्टील उत्पादक के तौर पर, भारत कच्चे माल की सुरक्षा के लिए जटिल वैश्विक परिस्थितियों का सामना कर रहा है। जहां चीन स्टील उत्पादन में सबसे आगे है, वहीं भारत का उत्पादन भी बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीनों में भारत का स्टील उत्पादन 153.61 मिलियन टन रहने का अनुमान है। इस विस्तार के लिए कच्चे माल के आयात में काफी वृद्धि की आवश्यकता होगी। घरेलू स्तर पर हाई-ग्रेड अयस्क की कमी के कारण, भारत के आयरन ओर का आयात वित्त वर्ष 2025-26 में सात साल के उच्च स्तर 1.2-1.4 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है। कोकिंग कोल का आयात भी बढ़ने की संभावना है, जिसमें कुल मेटालर्जिकल कोल (Metallurgical Coal) का आयात वित्त वर्ष 26 में 8.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल की तुलना में 9% की वृद्धि है।
बाहरी चुनौतियां: EU का CBAM और सप्लाई झटके
भारतीय स्टील इंडस्ट्री यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का भी सामना कर रही है, जिसने 1 जनवरी 2026 से कार्बन-गहन आयात पर अतिरिक्त लागत लगानी शुरू कर दी है। इससे लागत 8-14% तक बढ़ सकती है, जिससे भारतीय निर्यातकों को या तो कम कीमत स्वीकार करनी पड़ सकती है या नए बाज़ार खोजने पड़ सकते हैं। यह नियम भारतीय निर्यातकों के मार्जिन को 16-22% तक कम कर सकता है, जिससे उन्हें कीमतें कम करनी पड़ें।
घरेलू ऊर्जा संकट का असर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल की तलाश के बावजूद, भारत में घरेलू स्तर पर गंभीर कमियां बनी हुई हैं, जो ग्लोबल भू-राजनीतिक तनावों से और बढ़ गई हैं। स्टील सेक्टर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) और नेचुरल गैस की गंभीर कमी का सामना कर रहा है, जिसे मध्य पूर्व संघर्षों के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से एलएनजी (LNG) शिपमेंट में आई बाधाओं ने और बदतर बना दिया है। इस संकट ने JSW ग्रुप की कई सुविधाओं पर परिचालन बाधित कर दिया है, जिससे संभावित शटडाउन की चेतावनी दी गई है। इंडियन स्टील एसोसिएशन (Indian Steel Association) ने कहा है कि प्रोपेन और एलपीजी की कमी स्टील सेक्टर में छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) को नुकसान पहुंचा रही है। मध्य पूर्व से भारत के एलएनजी आयात पर 67% की निर्भरता इसे ऐसे सप्लाई झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है।
भविष्य की योजनाएं और निर्भरता
भारत का लक्ष्य 2030 तक स्टील उत्पादन को 30 करोड़ टन तक बढ़ाना है, लेकिन यह कोकिंग कोल के लिए मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया से आयात पर 85% निर्भर है। यह निर्भरता वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव और सप्लाई में रुकावटों के प्रति सेक्टर को असुरक्षित बनाती है।
समिट का लक्ष्य और आगे की राह
'भारत स्टील 2026' समिट का उद्देश्य कच्चे माल की सुरक्षा, टेक्नोलॉजी को अपनाने और टिकाऊ उत्पादन में चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग और गठजोड़ बनाना है। विश्लेषकों को भारत के स्टील आउटपुट में वृद्धि की उम्मीद है, लेकिन सेक्टर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों, ऊर्जा की कमी और उत्पादन को डीकार्बोनाइज़ (Decarbonize) करने की आवश्यकता जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों का प्रबंधन करना होगा। स्थिर और किफायती कच्चे माल तक पहुंच, उद्योग के विकास और वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में इसकी भूमिका के लिए महत्वपूर्ण है।