सरकार ने 16 सितंबर 2026 को एक हाई-लेवल मीटिंग में पुराने जहाजों से निकलने वाले स्टील को घरेलू मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल करने की योजना पर चर्चा की है। इस कदम का मकसद देश में स्टील स्क्रैप की कमी को दूर करना और औद्योगिक विकास को रफ्तार देना है।
भारत सरकार अब पुराने और कबाड़ हो चुके जहाजों से निकले स्टील को सीधे इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन का हिस्सा बनाने की तैयारी कर रही है। 16 सितंबर 2026 को हुई हाई-लेवल मीटिंग में स्टील, भारी उद्योग और बंदरगाह मंत्रालयों ने मिलकर उन बाधाओं को हटाने पर जोर दिया, जो सेकेंडरी स्टील को बड़े निर्माण कार्यों में इस्तेमाल करने से रोकती हैं।\n\nभारत दुनिया के शिप रीसाइक्लिंग मार्केट में 35.4% हिस्सेदारी के साथ लीडर बना हुआ है। इस नए कदम से भारत कच्चे अयस्क (raw ore) पर अपनी निर्भरता कम कर सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करना चाहता है।\n\n### क्वालिटी स्टैंडर्ड्स पर फोकस\nफिलहाल, शिप-ब्रेकिंग यार्ड्स से मिलने वाले स्टील का केवल 25% हिस्सा ही हाई-ग्रेड माना जाता है, जो भारी मैन्युफैक्चरिंग के काम आ सकता है। सरकार अब Bureau of Indian Standards और विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के साथ मिलकर इसके क्वालिटी मानकों को बेहतर बनाने पर काम कर रही है। अगर यह सफल रहा, तो मिड-टियर मैन्युफैक्चरर्स के लिए घरेलू कच्चा माल मिलना आसान हो जाएगा।\n\n### स्क्रैप की कमी और समाधान\nदेश का उद्योग हर साल 41 मिलियन टन फेरस स्क्रैप का उपभोग करता है, जबकि उत्पादन केवल 32 मिलियन टन है। इस अंतर को भरने के लिए सरकार 'Ship-breaking Credit Note Scheme' लेकर आई है, जिसमें स्क्रैप वैल्यू का 40% तक वित्तीय प्रोत्साहन (financial incentive) दिया जा रहा है।\n\n### चुनौतियां और मार्केट रिस्क\nनिवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस सेक्टर का प्रॉफिट मार्जिन ग्लोबल स्टील कीमतों और विदेशी मुद्रा (foreign exchange) की दरों में उतार-चढ़ाव से सीधे प्रभावित होता है। यदि वैश्विक बाजार में स्टील की कीमतें गिरती हैं या रुपया कमजोर होता है, तो कंपनियों का मार्जिन तेजी से घट सकता है। इसके अलावा, Hong Kong International Convention के तहत पर्यावरण और सुरक्षा के कड़े नियमों के चलते परिचालन लागत (operational cost) भी बनी रहेगी।
