आयात पर निर्भरता घटाने की बड़ी तैयारी
भारत, अपने समुद्री व्यापार को सुरक्षित करने और आत्मनिर्भरता हासिल करने के लक्ष्य के साथ, 2041-42 तक 437 जहाजों के अधिग्रहण की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। यह भारत के 'मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047' और 'मैरीटाइम इंडिया विजन 2030' का एक अहम हिस्सा है। वर्तमान में, भारत अपने 90% से अधिक व्यापार के लिए विदेशी जहाजों पर निर्भर है, जो आर्थिक और सुरक्षा दोनों ही लिहाज़ से एक बड़ा जोखिम है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारतीय शिपयार्ड (Shipyards) को लगातार ऑर्डर देकर उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाना है।
दो-तरफा रणनीति: घरेलू निर्माण और विशेष जहाजों की बोली
इस बड़े प्लान को दो हिस्सों में बांटा गया है। जहाँ ग्रीन टग (Green Tugs) और मीडियम-रेंज टैंकर (Medium-range tankers) जैसे 'स्टैंडर्ड' जहाजों का निर्माण देश के अंदर ही किया जाएगा, वहीं वेरी लार्ज गैस कैरियर्स (VLGCs) और वेरी लार्ज क्रूड कैरियर्स (VLCCs) जैसे 'स्पेशलाइज्ड' जहाजों के लिए संरचित बोलियां (structured bids) आमंत्रित की जाएंगी। हालांकि, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हर 8 में से कम से कम 6 जहाज भारत में ही बनें। इसके अलावा, कंटेनर जहाजों के ऑर्डर में भारतीय कंपनियों को 'राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल' (Right of First Refusal) का लाभ मिलेगा, ताकि स्थानीय कंपनियों को अधिक बढ़ावा मिल सके।
वैश्विक दौड़ में भारत की स्थिति और लक्ष्य
फिलहाल, भारत की शिपबिल्डिंग क्षमता लगभग 0.072 मिलियन ग्रॉस टन (GT) है, जो चीन (39 मिलियन GT), दक्षिण कोरिया (20 मिलियन GT) और जापान (9 मिलियन GT) जैसे देशों से बहुत पीछे है। भारत का लक्ष्य 2047 तक अपनी क्षमता को बढ़ाकर 4.5 मिलियन GT सालाना तक ले जाना है, ताकि वह दुनिया के टॉप 5 शिपबिल्डिंग देशों में शामिल हो सके। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने ₹25,000 करोड़ का मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड (Maritime Development Fund) और शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (Shipbuilding Development Scheme) जैसी पहलें शुरू की हैं। इन पहलों का मकसद भारत के $75 बिलियन के भारी-भरकम फ्रेट इम्पोर्ट बिल (freight import bill) को कम करना और 'मेक इन इंडिया, मेक फॉर वर्ल्ड' को बढ़ावा देना है।
चुनौतियां और आगे का रास्ता
इस महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने में कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। भारत के शिपयार्डों को पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में 25-30% अधिक लागत का सामना करना पड़ता है। यह बढ़ी हुई लागत कच्चे माल (जैसे स्टील) के आयात, कम वर्कर एफिशिएंसी (worker efficiency) और महंगे लोन की वजह से है। इसके अलावा, विशेष तकनीकी कर्मचारियों की कमी और आधुनिक टेक्नोलॉजी में बड़े निवेश की ज़रूरत भी प्रमुख बाधाएं हैं। इन चुनौतियों के बावजूद, सरकार की दृढ़ नीति और बड़े पैमाने पर फंड का आवंटन स्वदेशी शिपबिल्डिंग सेक्टर को बदलने की उम्मीद जगाता है।
