India Shipbuilding: ग्लोबल शेयर बढ़ाने के लिए तेज़ रफ़्तार ज़रूरी, नहीं तो चूक जाएगा मौका!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Shipbuilding: ग्लोबल शेयर बढ़ाने के लिए तेज़ रफ़्तार ज़रूरी, नहीं तो चूक जाएगा मौका!

भारत के लिए ग्लोबल शिपबिल्डिंग हब बनने का बड़ा मौका बस कुछ सालों का है। अगर देश अगले **तीन से चार साल** में अपनी शिपयार्ड क्षमता का विस्तार नहीं कर पाया और इंपोर्ट पर निर्भरता कम नहीं की, तो दुनिया में अपनी पहचान बनाना मुश्किल हो जाएगा। सरकार की तरफ से भले ही डोमेस्टिक शिपयार्ड्स के लिए काम सुनिश्चित किया गया है, लेकिन निवेशकों को असली ग्रोथ देखने के लिए प्रोजेक्ट्स का तेज़ी से पूरा होना ज़रूरी है। फिलहाल, भारत का ग्लोबल ऑर्डर बुक में शेयर **0.5%** से भी कम है।

Detailed Coverage

तेज़ रफ़्तार एग्जीक्यूशन और कंपोनेंट्स की चुनौती

घरेलू शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती है पार्ट्स के लिए बाहरी देशों पर निर्भरता। जहाज़ बनाने के लिए ज़रूरी करीब 60% से 70% कंपोनेंट्स इंपोर्ट किए जाते हैं, जिससे सप्लाई चेन और जटिल हो जाती है और प्रोजेक्ट में देरी व लागत बढ़ने का खतरा रहता है। निवेशकों के लिए, कंपनियों की लोकल मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम बनाने की क्षमता ही उनकी लॉन्ग-टर्म ग्रोथ की निशानी होगी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई प्रोजेक्ट्स का ऐलान तो हुआ है, लेकिन हकीकत में कंस्ट्रक्शन और फैसिलिटी डेवलपमेंट की रफ़्तार सरकारी लक्ष्यों से काफी पीछे है।

मार्केट में पोजीशन और डिमांड

आज की तारीख में, भारत का ग्लोबल शिपबिल्डिंग ऑर्डर बुक में शेयर 0.5% से भी कम है, जिससे वह दुनिया में ग्यारहवें स्थान पर है। इस स्थिति को सुधारने के लिए, सरकार ने सरकारी तेल और गैस कंपनियों को डोमेस्टिक शिपयार्ड्स से 200 से ज़्यादा जहाज़ सोर्स करने का आदेश दिया है। इस पॉलिसी से नियर-टर्म में शिपबिल्डर्स के लिए काम की कमी नहीं होगी। यह डिमांड मुख्य रूप से ड्राई बल्क कैरियर्स, कंटेनर शिप्स और जनरल कार्गो वेसल्स पर केंद्रित रहने की उम्मीद है।

क्षमता विकास का टाइमलाइन

सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, क्षमता बढ़ाने का टाइमलाइन दो हिस्सों में बंटा हुआ है। शिप रिपेयर फैसिलिटी में अगले तीन से पांच साल में बड़े सुधार देखने की उम्मीद है। वहीं, हैवी-ड्यूटी शिपबिल्डिंग कैपेसिटी डेवलप करना एक ज़्यादा कैपिटल-इंटेंसिव और टाइम-कंज्यूमिंग प्रोसेस है, जिसमें बड़े पैमाने पर क्षमता बढ़ाने में करीब पांच से आठ साल लग सकते हैं। इन शुरुआती, छोटे प्रोजेक्ट्स की सफलता ही यह साबित करेगी कि डोमेस्टिक शिपयार्ड्स कॉम्प्लेक्स ऑर्डर्स को समय पर और बजट के अंदर पूरा कर सकते हैं।

रीजनल कॉम्पीटिशन और इन्वेस्टमेंट

गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे कई तटीय राज्य नए शिपयार्ड्स और रिपेयर डॉक्स के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करने की होड़ में लगे हैं। गुजरात के पास फिलहाल इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में बढ़त है। इन अलग-अलग राज्यों के प्रोजेक्ट्स का परफॉरमेंस, और इंडस्ट्री की इंपोर्टेड पार्ट्स पर निर्भरता कम करने की क्षमता, मार्केट के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर होंगे। निवेशक उम्मीद कर रहे हैं कि प्रोजेक्ट कमीशनिंग डेट्स और डोमेस्टिक प्लेयर्स द्वारा इंपोर्टेड पार्ट्स पर निर्भरता कम करने की रफ़्तार पर अपडेट्स जल्दी ही सामने आएंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.