India Mining & Construction Capex: 2030 तक ₹10 लाख करोड़ पार! जानें क्या हैं संकेत

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AuthorNeha Patil|Published at:
India Mining & Construction Capex: 2030 तक ₹10 लाख करोड़ पार! जानें क्या हैं संकेत

भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर और माइनिंग सेक्टर में बड़ा उछाल आने वाला है। अनुमान है कि 2030 तक इन सेक्टरों में कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) यानी पूंजीगत खर्च **₹10 लाख करोड़** तक पहुँच जाएगा। यह 2025 के **₹5.5 लाख करोड़** के मुकाबले लगभग दोगुना होगा।

इंडस्ट्री पर असर और टेक्नोलॉजी में बदलाव

फिलहाल, माइनिंग और कंस्ट्रक्शन से होने वाली कमाई भारत के GDP में करीब 11% का योगदान देती है और 70 मिलियन से ज़्यादा लोगों को रोजगार देती है। जैसे-जैसे इंडस्ट्री बढ़ेगी, कंपनियाँ एडवांस्ड टेक्नोलॉजी जैसे ऑटोमेटेड मशीनरी और कनेक्टेड फ्लीट मैनेजमेंट की ओर बढ़ रही हैं। BEML जैसी कंपनियों ने इलेक्ट्रिक डंप ट्रक लॉन्च किए हैं, और कोल इंडिया (Coal India) फ्लीट मॉनिटरिंग सिस्टम का इस्तेमाल कर रही है। निवेशकों के लिए, ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) के लिए यह ज़रूरी होगा कि वे ग्लोबल प्लेयर्स से मुकाबला करने के लिए इन नई टेक्नोलॉजी को अपनाएँ।

लोकलाइजेशन की चुनौती

सेक्टर में अच्छी संभावनाएं होने के बावजूद, महंगे कंपोनेंट्स के लिए इम्पोर्ट पर बहुत ज़्यादा निर्भरता एक बड़ी रुकावट बनी हुई है। कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट में लोकलाइजेशन (स्थानीयकरण) औसतन 50% है, लेकिन ज़रूरी सब-सिस्टम्स में कमी है। उदाहरण के लिए, बैकहो लोडर में लोकलाइजेशन 85-90% तक अच्छा है, लेकिन एक्सकेवेटर जैसे भारी मशीनों के निर्माण में अभी भी विदेशी कंपोनेंट्स पर ज़्यादा निर्भरता है, जहाँ लोकल कंटेंट सिर्फ 55-60% है। हाइड्रोलिक सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल जैसे अहम पार्ट्स अभी भी बड़े पैमाने पर विदेश से मंगाए जाते हैं। इस निर्भरता से ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावटों और करेंसी में उतार-चढ़ाव का खतरा बना रहता है, जिसका असर डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।

ग्लोबल एक्सपोर्ट के मौके

भारत इस क्षेत्र में नेट एक्सपोर्टर (Net Exporter) बनने की राह पर है। 2025 में एक्सपोर्ट $4.9 बिलियन तक पहुँच गया, जो पिछले दशक में तीन गुना बढ़ोतरी है। माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट के ग्लोबल इम्पोर्ट मार्केट का वैल्यूएशन लगभग $150 बिलियन सालाना है, जिससे एक्सपोर्ट बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और गल्फ देशों में मैन्युफैक्चरिंग के नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं। इन मार्केट्स में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय कंपनियाँ कितने प्रभावी ढंग से मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और आफ्टर-सेल्स सपोर्ट सिस्टम बनाती हैं, साथ ही उन रीजन्स की खास जरूरतों को पूरा करने वाले प्रोडक्ट्स भी डेवलप करती हैं। आगे चलकर, इंडस्ट्री की तरक्की इस बात से तय होगी कि कितनी तेज़ी से कॉम्प्लेक्स मशीनरी का लोकलाइजेशन होता है और ग्लोबल मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक्सपोर्ट क्षमताओं को कितना बढ़ाया जाता है।

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